Yogendra Yadav Bjp Has Gone So Deep Into Power Salt By Lutyens
read summary →TITLE: Yogendra Yadav : BJP Has Gone So Deep Into Power, Leaving Is No Longer an Option | People’s Affairs CHANNEL: Salt By Lutyens DATE: 2026-04-25 ---TRANSCRIPT--- आप बताइए, पहले कभी ऐसा हुआ था कि कोई दूसरा देश भारत को ये कहे कि तुम अपना दाल चावल कहाँ से खरीदोगे। मैं आपको बता। trumpwonsonindias russian वार्निंग तो और रूस, हमसे कहता है कि अच्छा बेटा आप आ गया न मेरे से लेने के लिए तेल, अब ऐसा करो प्रीमियम रेट पे दूंगा चीन हमारे अरुणाचल प्रदेश में निगाह गाड़ कर बैठा है, मौके की तलाश में है, जिसे तीसरी दुनिया का सरताज हिंदुस्तान हुआ करता था, क्योंकि हिंदुस्तान फिलिस् 3 के सवाल पर बोलता था, दक्षिण अफ्रीका के सवाल पर बोलता था। वो उस बिरादरी में आज भारत की हिम्मत नहीं है कि ब्रिक्स की मीटिंग बुला ले। श्रीलंका के प्रधानमंत्री की हिम्मत होती है कि वो ट्रंप को औकात बता सकता है, स्पेन के प्रधानमंत्री की हिम्मत हो सकती है। मेक्सिको का प्रधान मंत्री बोल देता है, भारत का प्रधानमंत्री नहीं बोल सकता। मुझे तो शर्म आती है, सब कुछ ये देख के किस गर्त पर हम इस देश को ले आये हैं। 5000 करोड़ रूपया, 10 हज़ार करोड़ रूपया, 1 डिफेंस डील में जितनी रिश्वत ली जाती है, वो 10 हजार करोड़ रूपए से ज्यादा ह ट्रंप को पी, जो शायद दुनिया का सबसे बड़ा झूठा आदमी। इस वक्त मैं तो समझता था मोदी जी, लेकिन ट्रंप के आने के बाद मैं मान गया। भैया मोदी जी सिल्वर मेडल ले ले सकते हैं, गोल्ड मैडल तो ट्रंप पी लेगा। इस वक्त बीजेपी मोदी जी स्वयं चारों तरफ इनके नकेल है की अगर ये चाहे तब भी कुर्सी नहीं छोड़ सकते। ऐसा नहीं है की इससे पहले जो शासन करने वाले थे तो दूध के धुले थे। इस देश के संविधान के साथ, इस देश की आत्मा के साथ न्याय कुछ चंद गिने चुने नेताओं ने किया होगा, ज्यादातर ने नहीं किया। 1 साधारण व्यक्ति में यह भावना पैदा कर दी है। मोदी जी ने। भारत का गौरव जरा बढ़ा दिया। यह झूठ जो आर एस एस ने इस देश के बारे में चलाया है वो कहीं न कहीं करोड़ों भारतीयों के मन तक प पहुँचा है। ट्रंप कहता है की वैसे मैं चाहूँ तो मैं कुछ ऐसी बात कह सकता हूँ जिससे मोदी जी का पॉलिटिकल करियर खत्म हो जाएगा, लेकिन मैं नहीं। एस आई आर आ गया, अरे डीलिमिटेशन आ गया। वन नेशन, वन इलेक्शन। और यह संरचना क्या है। भारत के लोकतंत्र को का जो जमीन है उसका ढाल बदलने की वन नेशन, वन इलेक्शन का जो पूरा मॉडल है वो पहले तो इस देश उसके पीछे नीयत बड़ी साधारण। सी ओडिशा में बीजेपी लोकसभा में तो पूरा स्वीप कर गयी और विधान सभा में मेजोरिटी ले, यह संभव नहीं था। अगर ओडिशा में लोकसभा और विधानसभा चुनाव 2 अलग दिन में हुए। हालांकि ममता बनर्जी ने कोई कसर नहीं छोड़ी। अपनी तरफ से अगर उतना ही कोशिश, बाकी, सब पार्टियां सब राज्यों में करती तो हालात कुछ दूसरे हो नमस्कार आदाब। मेरा नाम शारदा है, आप मुझे सॉल्ट पर देख रहे हैं और हमारे साथ योगेंद्र साहब हैं। बहुत बहुत स्वागत है। सिर 3 बरस बीत गए, 3 बरस पहले मैं किसी 1 संस्थान के साथ नौकरी कर रहा था, तब आए थे और उस दौरान किताब की चर्चा नहीं थी लेकिन पूरे जीवन पर चर्चा हुई थी और 1 बड़ा वायरल सा चंक निकाल गया था। सलीम नाम को लेकर के आपके कुछ लंबा ही चला गया था। पर आज खुशी इस बात की है कि हम उस नाम से बहुत आगे बढ़। के देश में व्यापक मुद्दे आ चुके हैं, उस पर चर्चा करने वाले हैं। आपकी किताब जो आई है गणराज्य का स्वधन उस पर चर्चा करने वाले हैं। और फिलहाल जो ये नारी शक्ति बिल जो आया है उस पर भी हम लोग चर्चा करेंगे एस आई आर की चर्चा करेंगे क्योंकि 5 राज्यों में चुनाव हो रहे हैं। तो हम आपसे समझेंगे कि बेसिकली एस आई आर में क्या कुछ ऐसी कुरुतियां हैं जिसको लेकर के आम जनता को भरोसा तो नहीं हो पा रहा है लेकिन आईडी ली सरकारों को बनाया और बिगाड़ा जा रहा है। तो शुक्रिया हमें समय देने के लिए सर। सबसे पहले तो मैं यही सवाल करूंगा सर आपकी किताब के नाम से गणराज्य का शोध काफी गहरा और दर्शनिक नाम है। ये मैं ये समझना चाहता हूं सर कि जब आप इस नाम का चुनाव कर रहे थे तो आपके लिए गणराज्य का शोधन क्या है? आपने सही कहा नाम शायद लीक से हटकर है। कम से कम जिस तरह की सोच मेरे जैसे और मेरे मित्र रखते हैं, वो अमूमन इस तरह के शब्दों का व्यवहार नहीं करते हैं। और इसीलिए मैं इसकी बात करता हूँ। चूंकि मुझे लगता है कि इस देश में संविधान को बचाने वाली राजनीति को अपने लिए नए शब्दों का, नई भाषा का, नए मुहावरों का अविष्कार करना होगा। 70 वर्ष से इस देश का संविधान चल रहा है, पिचहत्तर वर्ष होगा। लेकिन हम हर नई पीढ़ी के लिए, उस संविधान की भाषा को नए मुहावरे में नहीं कर सके। और खासतौर पर जो कमजोरी रही, वो ये कि इस संविधान की जो आत्मा है, जो इस सभ्यता की आत्मा है, उसको हम जनता के मुहावरे में, जनता की भाषा तक नहीं ले जा सक। इसलिए संविधान चंद, लिबरल, प्रोग्रेसिव, रेडिकल इन लोगों की भाषा तक सीमित हो गया। वो भाषा जो कि जनता तक जुड़ती नहीं है। इसलिए ये दोनों शब्द इसमें जो है। गणराज्य और स्वधर्म दोनों शब्दों का चुनाव सायास है। ये कोई अनजाने में नहीं है, केवल किताब का शिक्षक देने के लिए नहीं। आपने देखा होगा इस किताब में बहुत लंबा इन दोनों शब्दों की व्याख्या की गई है। क्यों गणतंत्र अपने आप में पर्याप्त नहीं है? जन और गण मिल के गणतंत्र बनता है। लेकिन जन, गण और मन मिलके गणराज्य बनता है। यह रिपब्लिक शब्द को हमने बहुत छोटा कर दिया है। हमें गणराज्य को दोबारा लाने की जरुरत है। उसकी भावना को तो ये देखते हुए किया। स्वधर्म। बहुत गहरा शब्द है हमारे समाज का, हमारी संस्कृति का। जब मैं हमारी संस्कृति कहता हूँ, तो यह केवल हिंदू धर्म की संस्कृति नहीं है। हालांकि हिंदू धर्म में भी सैकड़ों धाराएं हैं। यह धर्म जो शब्द है, बहुत गहरा शब्द है हमारी संस्कृति का, जिसका रिलीजन से कोई ताल्लुक नहीं है। ये तो बिल्कुल हाल ही में धर्म को रिलीजन के अर्थ में समझा जाने लगा है। धर्म है। 1 वर्चु धर्म है जो कि धारण करने योग्य है, धर्म है, जो हमारा कर्तव्य है, जो करना चाहिए। और वो जिसे तमाम रिलीजंस के लोगों ने स्वीकार किया था। जब भारत में इस्लाम आया, उसने धर्म को कभी हिंदुओं की प्रॉपर्टी नहीं समझा। जब भारत में क्रिस्टियनिटी आई, अगर अंग्रेजों से हजार साल पहले भारत में क्रिटियानिटी आ चुकी थी, तो उन्होंने कभी भी धर्मणशब्द को किसी 1 रिलिजन का नहीं समझा, अपने विरोधी नहीं समझा। ये इस सभ्यता और संस्कृति का शब्द है। और स्वधर्म, जिसको अमूमन 1 जाति वर्ण स्वधर्म में सीमित कर दिया गया है। यह बहुत गहरा शब्द है। और मेरा कहने का तात्पर्य यहाँ की है। जिस कारण से मैंने इस शब्द को निकाला है। कि मेरी तलाश थी कि ये जो हमारा भारत गणराज्य है, इसकी आत्मा क्या है, इसके मूल में क्या है, इसकी जड़ में क्या है? और उस तक पहुँचने का 1 छोटा सा प्रयास है। मैं नहीं कहता कि मैं इसमें सफल हुआ हूँ। 1 नैतिक अनुबंध है, नैतिक अनुबंध कहा जा सकता है। अनुबंध। हालांकि ये कॉंट्रेक्ट, वेस्ट थिंकिंग में सब बातें आती हैं, लेकिन 1 कहीं न धर्म जो है, वो सिर्फ कांट्रेक्ट नहीं है, उससे कहीं गहरी चीज है, जो जो मेरे भीतर है, जो जो सत्व है, किसी चीज का वो है। और मैं समझता हूँ की हमे हमारी सभ्यता संस्कृति की जो बहु आयामी, धाराएं रही हैं, भारतीय सभ्यता की कोई 1 धारा थोड़ी है, न जाने कितनी धाराएं हैं, उन सब धाराओं में, मिला के क्या निचोड़ निकलता है, उसका वो ढूंढने की कोशिश है। निचोड़ ढूंढने के लिए लोग किसी शास्त्र को देखते है, फला, शास्त्र में लिखा होगा, फला। उसमें मेरी समझ में कोई इतिहासकार तो हूँ नहीं, लेकिन मेरी मोटी समझ यह है कि भारत के इस स्वधर्म की तलाश हमें किसी 1 शास्त्र में नहीं करनी चाहिए। हमें इस स्वधर्म की तलाश आंदोलनों में करनी चाहिए। अब आंदोलन सोचते ही आपको लगेगा पिछले। 10 15 साल के आंदोलन इतना मत सोचिए, ये बुद्ध धर्म क्या है? आंदोलन है, जैन धर्म क्या है, आंदोलन है, ये सूफी कौन है? आंदोलन कर रहे हैं, ये भक्ति, आंदोलन क्या है, आंदोलन है। यह देश आंदोलनों से परिभाषित हुआ है। और जिसका नवीनतम संस्करण था भारत का स्वतंत्रता संग्राम, आजादी का आंदोलन। इस देश ने कभी भी अपने आप को स्थिरता से परिभाषित नहीं किया है। बदलाव से आंदोलनों में जो चर्निंग हुई है, जो मंथन हुआ है, उस हर मंथन के दौर में इस देश का स्वधर्म सामने आया है। उसको ढूंढने की कोशिश है ये किताब अब आपकी पूरी बचत में मैं बस। 1 चीज समझना चाहता हूँ कि किसी भी 1 देश के विकास में धर्म का कितना योगदान होता है और धर्म के वैसे कितना रुकता है। वो विकास आपका नजरिया क्या है? मैं समझता हूँ, आपके मन में अभी भी आप शब्द इस्तेमाल कर रहे हैं। धर्म लेकिन आपके मन में रिलीजन अटका हुआ है। रिलिजन को छोड़ दीजिये, इसलिए दिक्कत यही हुई है की पता नहीं कैसे आज से सौ डेढ़ सौ साल पहले किसी ने रिलीजन का अनुवाद धर्म कर दिया और हम सब इस चक्कर में फंस ग। ये जो रिलीजन इसको मजहब कह लीजिये, पंथ कह लीजिये, संप्रदाय कह लीजिए, ये सब सम्प्रदाय हैं, इसे धर्म न कहिए हमारी भारतीय परंपरा में और फिर मैं कहूँगा? ये केवल जिसको हम हिंदू परम्परा कहते हैं, वो नहीं है। बुद्ध में धम्म क्या है? धम्म धर्म, धर्म दाराशिक शब्द का अनुवाद कर रहा है धर्म का और वो कभी भी इसका अनुवाद मजहब के स्टम्स में बिल्कुल नहीं करता है। यह विचार की धर्म का मतलब हो सकता है। 1 खास विशेष सम्प्रदाय और 1 खास तरह से प्रार्थना करने वाले लोग, ये कभी इस देश में नहीं रहा है। तो अगर आप मुझसे रिलिजन के बारे में पूछना चाहते हैं तो वो 1 अलग प्रश्न है। अगर धर्म के बारे में पूछना चाहते हैं तो मैं समझता हूँ कि किसी भी देश का और केवल भारत का नहीं, किसी भी देश की 1 स्वधर्म 1 आत्मा होती है। कुछ देशों में यह बात लिखित में होती है। इजरायल जिसके जो तथाकतित धर्म है, उससे मैं असहमत हूँ, मगर वो इजरायल कहता है कि हमारा देश फलाते के लोगों के लिए बना है और किसी के लिए नहीं बना। लिखित है। 1 जमाने में सोवियत संघ का जो धर्म था, स्वधर्म लिखित था, कई बार लिखित नहीं होता है, लेकिन वो है जिसे वहाँ का समाज धारण करता है। तो मेरा दावा यह है कि भारत का जो संविधान है, भारत का, संविधान की जो उद्देश्य का है, प्रिय है, उसके जो सिद्धांत है, वो केवल कोई दस्तावेज नहीं है। भारत का संविधान सौ साल के आजादी के आंदोलन का कपड़ा छान निचोड़ है। और ये जो सौ साल का, आजादी का आंदोलन है, ये हमारे 3000 साल की सभ्यता का निचोड़ है। तो अगर इस अर्थ में समझे तो धर्म राष्ट्र को बनाता है। और अगर आप पंथ या सम्प्रदाय के अर्थ में समझे तो मैं कहूँगा कि फिर उस धर्म से अगर धर्म का मतलब पंथ सम्प्रदाय है। तो संप्रदाय के प्रति निष्ठा देश को मदद नहीं करती, देश को मजबूत नहीं बनाती, उसके प्रति सतर्क रहना चाहिए। ये सम्प्रदायों का जो झगड़ा है, पंथों का जो झगड़ा है, वो इस देश को छोटा बनाते और दुनिया के हर देश को छोटा बना। अब भारत में इसे कैसे देखते हैं? भारत में ये जो संप्रदायों का झगड़ा है, हिंदू मुसलमान का जो हुआ 1 स्टेज में लगा था, आजादी के बाद 50 के दशक में कहीं लगता था कि पता नही इस देश का क्या होगा। लेकिन 1 इंसान की शहादत ने बचा लिया, इस दे गांधी ने गाँधी की शहादत में इस देश में जितना 47 के बाद हो सकता था। याद रखिए लाखों लोग लुट पिट के, पता नहीं क्या क्या अत्याचार सह के यहाँ आए थे और यहाँ से भी लाखों लोग। पता नहीं क्या कुछ दुर्दशा सह के उधर गए थे। उधर की बात उधर है। यहाँ पर क्या कुछ नहीं हो सकत। लेकिन 1 गांधी की शहादत ने इस देश पर 1 नैतिकता की चादर बिछा दी। का किला यह नहीं करेगी, वो आदमी मरा है। उसने बचा दिया और 70 साल के बाद लगता था कि अब यह इस देश का मुद्दा नहीं बचा। लेकिन दुर्भाग्य वर्ष आज इस देश में ये जो सम्प्रदाय के नाम पर इसे हिंदुत्व नाम दिया जाता है। इतने सुन्दर शब्द का इतना घटिया दुरुपयोग लोग करते हैं। यह कोई अजीब बात नहीं है। राजनीति में होता है जो बेसिकली। कहना ये है कि भाई। 1 संप्रदाय के लोगो का इस देश पर बोलबाला होगा। 1 संप्रदाय के लोग मकान मालिक है, बाकी सब किराएदार है। ये जो भावना है, ये तो देश को तोड़ने वाली भावना है। अगर ये धर्म है, इसको मैं धर्म नहीं बोलता है तो अधर्म है। कम से कम भारत के स्वधर्म के साथ यह गद्दारी है, यह अधर्म है। अधर्म ही नहीं, मैं तो इसको विधर्म बोलता हूँ। क्योंकि ये भारत के जो स्वधर्म है, उसका ठीक विलोम है। अधर्म तो यह होता है कि आप सुबह गए मंदिर में सवा रुपया 11 रुपया, 1 सौ, 1 रूपया चढ़ाया, दिन भर जाके। उलटे काम किए, शाम को आके पर हाथ जोड़ दिये तो धर्म है। वो दुनिया में आम तौर पर लोग किया करते हैं। दुनिया में पाखंड करना, ये सब तो इंसान की वृद्धि रही है। अपने देश को क्यों दोष है, सब तरफ ही चलता है। विधर्म वो है जहाँ आप आँख में आँख डाल के बोलते हो की क्यों करूँ। क्या ऐसा काम क्यों करूँ? दिक्कत यह हुई है कि इस देश में 60, 70 साल। अधर्म तो चला। ऐसा नहीं है कि इससे पहले जो शासन करने वाले थे, को दूध के धुले थे। इस देश के संविधान के साथ, इस देश की आत्मा के साथ न्याय कुछ चंद गिने चुने नेताओं ने किया होगा, ज्यादातर ने नहीं किया। लेकिन पिछले 10 साल से तो हम वो देख रहे हैं जो अब आँख में आँख डाल के बोल रहे हैं। कि क्या जरूरत है इसकी, ऐसा भारत बनाने की? क्या जरुरत है। मैं करूँगा, मेरे लोगों का बोलबाला होगा। ये जो है, ये भारत के साथ गद्दारी है, यह देशद्रोह है। क्योंकि आजकल देश भक्त और देशद्रोह का लेबल देने की बीमारी चल निकली है। तो मैं भी बता देता हूँ कि सबसे बड़े देशद्रोही वो लोग हैं जो भारत माँ के 2 बच्चों के बीच फूट डालते हैं, दिन रात झगड़े का बहाना ढूंढते हैं और किसी न किसी तरह से 1 दूसरे में नफरत पैदा हो, इसका खेल कर रहे हैं। वो सबसे बड़े देश द्रोही है। इस पर 1 और आगे सवाल आएगा। लेकिन आपकी किताब में आपने किशन पटनायक, सचेत, नन, सिन्हा और अशोक सेक्सरिया को समर्पित किया है, यह पूरी पुस्तक इन्होंने आपके जीवन में क्या छाप छोडी और आपकी किताब लिखने की प्रक्रिया में उनके विचारों का कितना योगदान है, जिसके वजह से आपने इसे समर्पित किया। उन्हें तीनों का नाम सुनते ही आ। 1 दम जैसे कहते है, अंदर तक ठंडक आ गई। मेरा सौभाग्य था अनिल जी, मैं जब यूनिवर्सिटी में पढ़ता था, शुद्ध संयोग से, मैंने इसके लिए कुछ नहीं किया। मैं इसका कोई सुपात्र नहीं था। विशुद्ध संयोग के चलते मैं ऐसे लोगों के संपर्क में आया जिनके बारे में मैं विश्वास से कहता हूँ। अगर इन 3 लोगों की परछाई किसी पत्थर पे पड़ जाती, न वो पत्थर भी नरम हो जाता। उस पत्थर में भी कहीं आत्मा आ जाती। वो पत्थर भी कुछ कहता कि ऐसा काम तो मैं नहीं करूँगा। मेरा संयोग था। मैं यूनिवर्सिटी में पढ़ता था। वहाँ समता युवजन सभा करके हमारा 1 संगठन था, जो कि गांधीवादी, समाजवादी, विचारधारा में विश्वास करता था। लोहिया से प्रभावित लोग थे, जिसमें उनके जरिए जेएनयू में, उस जमाने में लेफ्ट का डोमिनेंस हुआ करता था। और हम लेफ्ट के समर्थन में नहीं थे। जो स्थापित लेफ्ट था, उसके विरोध में थे। क्योंकि स्थापित लेफ्ट कॉम्ने था, मैक्सिस था, हम नहीं थे। हम तो गांधीवादी थे, वो अलग बात है। लेकिन उसके चलते कृष्ण जी और सजदा जी से परिचय हुआ और बाद में अशोक सेकसरिया से परिचय हुआ। यह शायद प्रसिद्ध लोग नहीं हैं, शायद लोग नहीं जानते, कम लोग जानते हैं, बहुत कम लोग जानते हैं इनके बारे में। लेकिन मैं बता सकता हूँ। मैं जिंदगी में जितने खूबसूरत लोगों को मिला, उनमे से अधिकांश राजनीति में थे। ये बात अटपटी लगेगी। क्यों रानी लोगों के मन में वो होता है। झूठे कपटी पैसा बनाने वाले के नायक 32 साल की उम्र में एमपी बन गए। जब मैं पढ़ रहा था तो 1962 में वो बने थे और उनका 1930 का जन्म है। तो 32 साल के रहे। होंगे मेंबर पार्लियामेंट बन गए थे। अब आप बताइए जो लड़का 32 साल की उम्र में मेंबर पार्लियामेंट बन जाए, उसकी क्या शोहरत होती है। जब वो 60 साल का होगा तो कितनी बिल्डिंग होंगी, कितनी कारें होंगी, क्या कुछ साम्राज्य होगा। और ये कृष्ण पटनायक जब गए न, इनके पास अपना घर नहीं था, इनका गुजारा आँख अपने एमपी न होने के बाद से उस जमाने में पेंशन मिला करती थी। पर कृष्ण जी ने कहा नहीं 60 साल से पहले मैं पेंशन कैसे ले सकता हूँ। जब इस देश में किसी व्यक्ति को 60 साल से पहले पेंशन नहीं मिलती। मैं कैसे पेंशन पेंशन लेते नहीं थे, गुजारा कैसे होता था। उ उनकी पत्नी 1 स्कूल में म्यूजिक टीचर थी। उस पत्नी की सैलरी पर दोनों लोग गुजारा करते थे। पति पत्नी ने तय किया कि हम बच्चे नहीं करेंगे, क्योंकि कहीं न कहीं इससे स्वार्थ जुड़ जाएगा। जीवन में और कोई बैंक बैलेंस नहीं, कोई घर नहीं। बाद में वाणी जी ने अपना घर, वाणी जी कभी भी देहांत हुआ है। बाद में उन्होंने 1 छोटा सा फ्लैड भुवनेश्वर में बना लिया था। कुछ नहीं था। आप कल्पना नहीं ये बातें जब लोगों को कहता है, उन्हें विश्वास नहीं होता की पता नहीं कहाँ ऐसी कहानी बना रहे हो। आप। कृष्ण पंडाजी तो ओडिशा के कालाहंडी ऐसे क्षेत्र से आते है जो इतना पड़ा है। वो एमपी बने थे। यहाँ से। संबलपुर से एमसबनेथेजनमउनका कालाहंडी में हुआ था। तो आप विश्वास नहीं कर सकते। मैं कृष्ण जी के साथ 20 वर्ष रहा। 1 तरह से जो बच्चा उनके रहता है, वैसी मेरी थी। मैंने उस 20 वर्ष में कृष्ण जी को 1 बार भी झूठ बोलते हुए नहीं सुना। छोटी चीज के लिए, बड़ी चीज के लिए नहीं। यह काम मैं नहीं कर पाया, यह मैं नहीं कर पाऊंगा। मैं उस दिन आना चाहता था, नहीं आ पाया। मैंने माफ कीजिए। मैंने 2 कमिटमेंट कर दिए। मुझसे गलती हो गई है। मगर झूठ कभी नहीं बोलते। सुना कल्पना से बाहर है कि ऐसा व्यक्ति झूठ नहीं बोलता होगा। राजनीति माफी मांग लेना, लेकिन झूठ नहीं बोलना। इतनी कड़वी बात स्वीकार कर लेना। सार्वजनिक जीवन में जो मैं दंग रह गया कि कैसे आपने बात मान ली। सचिदानंद सिन्हा, उनके पिताजी उस वक्त बिहार के मंत्री थे और वो क्या कर रहे थे। वो बम्बई में कोयला खादान के वर्कर की यूनियन बनाने के लिए रेलवे में कोयले के खलासी की तरह काम कर रहे थे। बाप मंत्री था बिहार का यह सजदा, जितनी किताब उन्होंने लिखी हिंदुस्तान के 10 प्रोफेसर मिल के नहीं लिख सकते, उतनी किताबें और आप जाते। उनका भी पिछले साल देहांत हुआ है। आप जाते उनके घर। 11 कच्चा घर बना के गाँव में बिहार के रहते थे, एकदम ऋषि की तरह, साधु, अशोक सेकसरिया कलकत्ता की प्रसिद्ध मारवाड़ी परिवार के बच्चे, 1 प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी के बेटे और वहां की बड़ी इंडस्ट्रियल फैमिली के वार लोड सिन्हा रोड पे अपने परिवार की कोठी के सर्वेंट क्वार्टर में रहते थे और उस सर्वेंट क्वार्टर के भी 1 छोटे से कोने में रहते थे। लोग कल्पना नहीं कर सकते कि ऐसे लोग दुनिया में हुए होंगे। मैं इनको मिला। इन लोगों ने जैसे कहते है, ये किसी भी मिट्टी से घड़ा बना सकते थे। मैं भी उस मिट्टी में से था। मेरा क्या था इस मिट्टी को पकड़ के इन लोगों ने इंसान बना दिया। इनसे सोचना सीखा, इनसे बात को कहना सीखा, ये सीखा कि सच बोला जाए। मैंने अशोक जी को अपना लेख भेजा, जो मुझे लगा की मैंने बहुत सुंदर लेख लिखा था। क्योंकि मैंने कुछ कस के मुहावरों का इस्तेमाल किया था। अशोक जी ने। छोटा सा पोस्ट कार्ड भेजा इसमें कुछ अतिश्योक्ति लगती है। मुझे के मुहावरे के प्रयोग के चक्कर में तुमने सच से थोड़ा सा ऊँची बात कर दी है। यह मत करो। ये कहने वाले लोग थे। तो इनके बारे में तो क्या कहो। तो सौभाग्य था मेरा कि मैं इन्हें मिला और मुझे 1 कर्ज। महसूस होता है कि इन्होंने मुझे जो दिया वो क्या मैं अपनी जेब में रख के मर जाऊंगा या मैं किसी तक देके जाऊंगा। आज मुझे जिंदगी का सबसे बड़ा उद्देश्य कोई लगता है तो ये लगता है कि मुझे इनसे अपने पिता जी से, अपने कई टीचर्स से भी, फॉर्मल, टीचर्स से भी। इनसे जो कुछ मिला यह मेरा हक नहीं है। यह तो संयोग वश मुझे मिल गया। मैं इसका ट्रस्टी हूँ। मुझे मरने से पहले किसी को सौंप के जाना है, किसी 1 को नहीं। सौ 50, 500 हजार 2010 हजार लोगों को सौंप के जाना है ताकि वो उस बात को उससे बेहतर कर सके। क्या कर रहे हैं आप इस चीज के लिए? 1 तो लिखता हूँ बोलता हूँ। हाल ही में 1 चीज शुरू की है जिसे हम जन गण मन कहते हैं। 1 सिलसिला शुरू किया है जिसमें देश भर के युवाओं को हमने आमंत्रित किया, सबको किया। लेकिन चयन युवाओं का किया है कि आइये 5 हफ्ते ऑनलाइन क्लासेस करेंगे और उसके बाद उनमें से कुछ चुने हुए लोगों के साथ मिल के 10 दिन बैठूंगा साथियों के साथ। ताकि यह चीज आगे करे। और कोशिश है की इसलिए बार बार लिखता हूँ लिखता इसलिए नहीं हूँ की मै कोई लेखक बनना चाहता हूँ, मैं कोई लेखक हूँ, नहीं मैं तो जो चीज मेरे पास संयोग से आ गयी वो आगे पहुँचाना चाहता हूँ। इन सवालों पर कैसे सोचा जाए। क्योंकि मुझे लगता है कि इस देश में जो संविधान को बचाने की कोशिश कर रहे हैं, जो सही लोग हैं, जिनके साथ मैं संघर्ष करता हूं, जिनके साथ उनके पाले में मैं खड़ा रहता हूं, वो भी शायद ठीक तरीके से सोच नहीं रहे हैं। और ये हिम्मत किशन जी से मिली है अपने साथियों के सही जगह पर खड़े होते हुए भी पूरा सच बोलने की कोशिश करना। सजदा जी से मिली की बारीकी से, दीर्घ, काल से। इस चीज को सोचना। अशोक जी से मिली कि जो लिखना, जो सच है, बस उतना ही लिखना, उससे ज्यादा लच्छेदार के चक्कर में न पड़ना। तो इसकी कोशिश कर रहा हूँ। बाकी आप कहेंगे तो और अच्छा कर लो। सर आप जिन लोगों के विचारों से इतने प्रभावित हैं कि मुझे ऐसा महसूस हो रहा कि आप भावुक भी हो जा रहे हैं। पर क्या उनकी राजनीति, उनके विचार, आज के भारत में रेलवे है? स्पेस है उसका क्या कोई वैसी राजनीति करने की कोशिश कर भी रहा है? कर नहीं रहा तो हमें करनी चाहिए। इसमें कोई शक नहीं है की आज वो राजनीति करने की कोशिश बहुत कम लोग कर रहे हैं। लेकिन सच यह है कि अपने जमाने में भी वो लोग हाशिए पे थे किशन पटनायक, समाजवादी, परंपरा के मेरे विचार से सबसे बड़े चिंतक हुए। इक्कीसवी सदी बीसवीं सदी के अंत होने मधुलिमये के बाद 1 मात्र है तो उस लिहाज से किशन पटनायक है न। लेकिन उस जमाने में भी बिल्कुल मार्जिन पे थे न। सांसद बने तो 1 तरह से हाशिए पर रहना 1 नियति है। सच कई बार हाशिए पर खड़ा रहता है, लेकिन उससे वो छोटा नहीं हो जाता। सच हाशिय से हमें मिलता है। गांधी ने। 1900 9 में जो किताब लिखी थी, उसको पढ़ के उस जमाने में न जाने कितने लोगों ने कहा हो गया, कि पगलेट है, पता नहीं कैसी बातें लिख रहा है। नेहरू को भी कभी विश्वास नहीं हुआ उस किताब में। लेकिन गाँधी ने वो सच बोलने की हिम्मत की थी। तो ये कहना की वो विचार आज लोग नहीं चला रहे, बिल्कुल सही बात है। आज के लिए प्रासंगिक नहीं है। यह बिल्कुल नहीं है। आपको किसी 1 चिंतक आपको सोचने का तरीका देता है। क्योंकि लोगों का जिन से प्रेरणा ग्रहण करते हैं, उनसे अजीब तरह का रिश्ता रहता है कि उनके 11 वाक्य को दोहराना, उनकी उक्तियों को दोहराना, उनके किए काम की पुनरावृति करना, ये गुरु के साथ कभी नहीं करना चाहिए। गुरु के साथ दगा, ये सब करना। तो उसने किस तरह से सोचा? वैसी सोच, अपने वक्त के बारे में करना, ये हमारा दायित्व है। सर मैं 1900 1 से लेकर के और 1947 तक अभी भी मैं पढ़ रहा हूँ। बहुत सारी चीजें जानकारी जुटाने की कोशिश कर रहा हूँ। कभी आपसे बात हो गई। अभी कुछ दिन पहले मणिशंकर अयर साहब के साथ ढाई घंटे। मैंने बातचीत रिकॉर्ड की, तो उन्होंने कुछ कुछ सुझाया, तो फिर मैं जाके पढ़ा। मुझे नहीं मालूम कि उस दौर में भारतीय मीडिया कितना सक्षम था। 1 नेरेटिव को दूसरे नेरेटिव के पक्ष में गढ़ के, उसे कम कर देने में। आप जिन। 3 विचारकों की बात कर रहे हैं। न समकालीन। और भी कई सारे विचारक होंगे, जो आप कह रहे हैं कि उस दौरान भी हाशिए पर थे। आप जिस तरह के विचार को लेकर आगे बढ़ रहे हैं, जो राजनीति करने की कोशिश कर रहे हैं, जो लोगों को जागरूक करने की कोशिश कर रहे हैं, कहीं न कहीं आप मानते हैं कि आप भी इस सिस्टम में हाशिय पर हैं, उतने लोगों तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। पर ये मेरी समझ है कि उस दौर में इतना मतलब, इलेक्ट्रॉनिक चीजें नहीं थीं कि परसेप्शन को इमीडिएट तोडा जा, सके, मरोडा जा, सके। 1 नया गढ़ दिया जाए। आज है। आज जो लोग हैं, वो सोशल मीडिया पर बहुत ज्यादा एक्टिव हैं। इन्फ्लूएंसेस का दौर आ गया है मीडिया में, जहां आप कई सारे मीडिया चैनलों पर जाके बातचीत करते हैं, आप उनके विचारों से सहमत नहीं होते हैं। लेकिन जबरदस्ती आप अपने विचार को रखने जाते हैं। ऐसी परिस्थिति में जब 1 देश, युवा देश अपने नए विचारों के साथ, अपनी नई अपेक्षाओं के साथ आगे बढने की कोशिश कर रहा है, क्या आपको लगता है कि वो ऐसे विचारों को अपने माथे पर सजाना चाहता भी है या नहीं? यह मेरा बेसिक अंडरस्टैंडिंग के लिए सवाल है। सर दुनिया में कभी भी सच और प्रसांगिक नहीं होता। ट्रंप को भी जो शायद दुनिया का सबसे बड़ा झूठा आदमी। इस वक्त दुनिया में झूठ का यदि मतलब मैं तो समझता था मोदी जी। लेकिन ट्रंप के आने के बाद मैं मान गया। भैया मोदी जी, सिल्वर मैडल ले ले सकते हैं। गोल्ड मैडल तो ट्रंप पी लेगा। इसमें तो कोई संदेह नहीं है। ट्रंप भी अपने सोशल मीडिया का नाम क्या रखता है। ट्रुथ सोशल सच की ऐसी मजबूरी है कि वो ट्रंप के सर पे भी बैठती है। दिन रात झूठ बोलता है, लेकिन उसे भी सच कहना पड़ता है। अपने उसके नाम को सच रखना पड़ता है। मोदी जी अभी संसद में बोल रहे थे, बोल रहे थे, हास्यास्पद, बातें बोल रहे थे, बोल रहे थे। ऐसी बातें जिनका कोई सर पैर नहीं है। लेकिन उसको सच का जामा पहनाने की कोशिश कर रहे थे। बड़े से बड़ा झूठा और मक्कार व्यक्ति भी सच के सामने शीश नवाता। अब आप कहेंगे? ये तो पाखंड है, बिलकुल सही है, वही है कि मंदिर में जाके सवा रुपए का प्रसाद चढ़ाने वाला मामला है। लेकिन पाखंड 1 बहुत सुंदर चीज होती है। पाखंड 1 तरह से सच के प्रति ट्रिब्यूट होती है की वो पाखंडी व्यक्ति कह रहा होता है कि मैं सर तो नमन करता हूँ, बाकी मेरी क्षमता नहीं है, मैं दिन भर लागू नहीं करूंगा, लेकिन वो करता हूँ। सच कभी अप्रासंगिक नहीं होता है। अंतत आप उसपे आते हैं। आज देखिये आज हम ये कहते हैं की भारत का मीडिया सदैव बहुत अच्छा रहा था, कतई बात नहीं है और आप जा के 1 छोटा सा काम करना। भगत सिंह ने अखबारों के बारे में क्या लिखा था? आप पढ़ लेना क्या संप्रदाय हिंदू, मुस्लिम सवाल पर अखबारों की क्या भूमिका है। भगत सिंह ने जो लिखा था आपको लगता है बिलकुल आजकल के अखबारों के बारे में लिखा है। मेरे मुह से 12 अखबारों का नाम निकालने वाला था, तो बिलकुल उनके बारे में लिखा है। तो पहले भी ऐसे थे जो 1 चीज नहीं हुई है। वो यह है कि पहले अखबार चरण बंदना करते थे, जो सत्तावाद थे, चरण बंदना, कभी कभी थोड़े से, कभी रिंग के करते थे, कभी झुक के करते थे, लेकिन करते थे मगर। जो दूसरे लोग हैं, विपक्ष में हैं, जो सच बोल रहे हैं, उनके खिलाफ भेड़िए जैसा व्यवहार नहीं करते थे। अब भेड़िए वाला काम भी शुरू कर दिया। पिछले कुछ सालों से इस देश में की अब मतलब आप। आज सुबह हर अखबार में फ्रंट पेज पर है। सरकार यह आश्वासन देती है कि हर राज्य का किसी राज्य का कोटा नई संसद में कम नहीं होगा। सरकार ने आश्वासन दिया किसी पत्रकार की हिम्मत नहीं के साथ में लिख दे। लेकिन सरकार यह पूछ ले की भैया जो आपने आश्वासन दिया है वो संसद में आपके लाये हुए कानून में कहाँ लिखा है। जरा बता तो दीजिये या यही लिख दे की सरकार ने कानून में तो नहीं कहा लेकिन मौखिक आश्वासन दिया, इतना ही सच बता दीजिये, इतनी भी हिम्मत नहीं है। तो यह बात सच है की आज हम 1 झूठ के साम्राज्य में जी रहे हैं, लेकिन जितना घना अंधेरा होता है, 1 छोटा सा टिमटिमाता दिया उतनी ही दूर से दिखाई देता है। मैं आपको बताता हूँ ये बीजेपी वाले, यह आर एस एस वाले जब अलग से कहीं मिलते हैं, न हाथियों पकड़ कर दबाते हैं। योगेश जी क्या करें, मजबूरी है करना पड़ता है। आर एस एस वाले। अनजान लोग मुझे सड़क पर मिलते हैं, साइड में ले जाते हैं। कहते हैं देखिए मैं संघ का हूँ 3 जनरेशन से मेरा वोट तो मैं मोदी जी को दूंगा, लेकिन आप कुछ विपक्ष को मजबूत कीजिये न क्या हो रहा है। इस देश में सच मरता नहीं है। जिस दिन सच मर गया उस दिन इंसानियत। सभ्यता सब कुछ समाप्त हो जाएगी। इसलिए जो सिर्फ यह होता है कि 1 जमाना होता है जिसमें सच बोलने वाले थोड़ा सर उठा के जीते हैं और सारे लोग उनकी तरफ यूँ करके देखते हैं। और 1 जमाना आता है जिसमें सच बोलने वाले सड़क में पत्थर और कीचड़ से अपने आप को बचाते हुए निकालते हैं। जैसे ज्योति बा फुले को करना पड़ा था कभी। लेकिन वही समय होता है। याद रखिये, आज हम उसी ज्योति बा फुले को याद करते हैं जिसको वो पत्थर और कीचड़ से आना पड़ा था। आज हम सुप्रीम कोर्ट के उन विभूतियों को याद नहीं करते जो बड़े बड़े न्यायाधीश थे। हम उस एच आर खन्ना को याद करते हैं जिसको इमरजेंसी में सच बोलने की हिम्मत हुई थी। सच आएगा इंसानीयत मानवीय सभ्यता में सच समाप्त होने वाला नहीं है, बस 1 समय आएगा, थोड़ा सा बादल आ जाएंगे, थोड़ा सा अंधेरा आएगा। और उस वक्त और भी ज्यादा जरूरी है कि सच बोलने वाले सर उठा के बोले ठीक है। सर आपने अपनी किताब में अध्याय है। हमारा हमारी संस्कृति पराजय, इसमें अपने एंटोनियो गरमसी के रिजमी सिद्धांत को उसका जिक्र किया है। मैं आपसे यह समझना चाहता हूँ कि इस समय जब भारतीय राजनीति में क्या लोकतंत्र में आपको वो हज, मनी दिखाई देती है, सिर है, बिल्कुल है। इसमें तो कोई शक की बात ही नहीं। देखिये एंटोनियो ग्राम्शी कौन थे, वो तो बहुत कोई लंबा, कोई बहुत बारिक और असंभव के सम का सिद्धांत नहीं है। एंटोनियो ग्राम्शी फासिस् इटली के फास का विरोध करने वाले 1 राजनीतिक कार्यकर्ता थे, जो की जेल में बंद थ और जेल में बंद होते हुए उन्होंने उनके सारे साथी कह रहे थे कि फासिज्म जो है वो जनता विरोधी है, डंडे से चलाया जा रहा है। यह दमन पर आधारित सरकार है। एंटोनियो ग्राम्सी ने जेल में बैठ के सोचा और कहा कि हां, डंडा तो चला रही है, दमन तो कर रही है, लेकिन कहीं न कहीं इस सरकार को जनता की सहानुभूति प्राप्त है। चूँकि फासिस्ट सरकार भी जनता से वैधता प्राप्त किए बगैर रह नहीं सकती। यह बहुत पीड़ादायक सच था। जो ग्राम लिख सकते थे, तो उसका मैंने इसलिए हवाला दिया है। हम सब में मेरे दोस्त तमाम कहते हैं मोदी सरकार दमन पर आधारित है, बिल्कुल दमन पर आधारित है। कहते हैं कि चुनाव चुनाव में हेराफेरी करते हैं, बिल्कुल हेरा फेरी करते हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है। कहते है कि पैसे पर आधारित है, मोदानी की सरकार है। कहते हैं मीडिया कैप्चर किया हुआ है, हुआ है। लेकिन इसके साथ में कहीं न कहीं दिलो दिमाग पर कब्जा किया है। और इस बात से इनकार हम नहीं कर सकते। और जो विचारधारा समाज के कॉमन सेंस का हिस्सा बन जाए तो ऐसी स् में आप क्या करेंगे। वही चुनौती है। देखिये ग्राम क्या कह रहा है, यही बात कह रहा है कि जो फास जिसका हम विरोध कर रहे हैं, मेरा विरोध करने वाले ने 1 सफलता प्राप्त की है और वहाँ मुझे लड़ाई शुरू करनी है, तो लड़ाई सिर्फ वो नहीं है। जो 1 फ्रंट के ऊपर बैठ के लड़ाई होती। ये बंकर में बैठ के लड़ने वाली लड़ाई है। लंबी लड़ाई ग्राम का यही कहना था और में उनका हवाला देते हुए, क्योंकि बहुत इतना हिम्मत चाहिए, सब बातों को कहने के, जैसे मैंने कहा कृष्ण जी में मैंने वो हिम्मत देखी थी। ऐसी बातें बिल्कुल साफ कह देते थे, जो कहते हुए लोग घबराते थे। बीजेपी पिछले 11 साल से इस देश में जो सत्ता में है, वो सिर्फ इसलिए नहीं है कि उसने चुनाव जीते हैं, सिर्फ इसलिए नहीं है कि उसने हेरा फेरी की है, सिर्फ इसलिए नहीं है कि उसने पैसा किया है और डंडा लाठी डंडे का प्रयोग किया। यह सब किया है। लेकिन इसलिए भी है कि उसने सांस्कृतिक जमीन पर कब्जा किया और सांस्कृतिक जमीन पर। कब्जा आप सिर्फ लाठी से नहीं कर सकते? बीजेपी ने 1 साधारण हिंदू के मन में ये भावना जगा दी है कि ले देखे, मेरे लोग तो यही है, मेरी टीम के समर्थक तो यही है, जिसका कोई मानने का आधार नहीं है। 1 साधारण व्यक्ति में यह भावना पैदा कर दी है की मोदी जी ने भारत का गौरव जरा बढ़ा दिया। मानने का कोई आधार नहीं है। एकदम झूठा ये बात, लेकिन गाँव में बैठा हुआ साधारण व्यक्ति इस बात में विश्वास करता है। इसलिए जब तक आप इन बातों को या यह बात की भाई देखो, यह आदमी 18 घंटे काम करता है। और ठीक है, गलती हर इंसान से होती है, लेकिन काम तो देखो देश के लिए करता है। आगे इसके न कोई पीछे। अब वो कहानी में मैं जाना नहीं चाहता। आगे पीछे वाले। लेकिन जब तक जनमानस में प्रचलित इन धारणाओं को आप खंडित नहीं करते, जब तक 1 साधारण व्यक्ति के मन में बने हुए इन विचारों से आप संघर्ष नहीं करते, तब तक केवल चुनाव में आप बीजेपी को नहीं हरा सक और अगर हरा भी दिया, उसका कोई मायने नहीं है। 5 साल बाद दोबारा हो जाएगा। अंतत, यह बेचारी लड़ाई है। अंतत 1 सांस्कृतिक लड़ाई है। और उस सांस्कृतिक वैचारिक लड़ाई के लिए हम लोग तैयार नहीं हैं। मतलब आप ये कह रहे है कि जो विपक्ष है, वो आइडियोलॉजिकल जो लड़ाई है, वैचारिक लड़ाई वो हार चुका है, है। अगर आप 1 बैटल। और वार में कहा जाता है, लड़ाई और युद्ध तो लड़ाई तो हारे हैं, नहीं तो 2014 में जो हुआ वो क्यों हुआ, 2019 में क्यों हुआ? 2024 में 240 सीट भी क्यों आई, इनकी कहीं न कहीं 1 लड़ाई तो हारे हैं, लेकिन हम सभ्यता का युद्ध नहीं ह। युद्ध जीतने के लिए हमें पहले स्वीकार करना होगा की हम 1 लड़ाई हारे हैं और लड़ाई का मतलब केवल चुनावी नहीं, हम 1 सांस्कृतिक वैचारिक लड़ाई हारे हैं। जब तक इस बात को हम ईमानदारी से कुबूल नहीं करेंगे, तब तक हम आगे नहीं बढ़ पाएंगे। यह मान लेना कि मेरे विचार तो सब ठीक है, पता नहीं कहाँ से लोग बेवकूफ में विश्वास करने लग गए। ये जो हमारे सामान्य प्रोग्रेसिव, लोग ये बात समझते हैं, यह बहुत नुकसान करने वाली बात है, बिल्कुल अमेरिका के प्रोग्रेसिव लोग भी यही मानते हैं। अमेरिका की किसी यूनिवर्स्टी में आप चले जाइए, न्यू यॉर्क चले जाइए, बर्कले चले जाइए, केलिफोर्निया सब मानते हैं की यह ट्रंप तो बेवकूफ, पता नहीं कहाँ से आ गया। अमेरिका तो बिलकुल तो बड़े प्रोग्रेसिव देश है। जब तक आप इसको स्वीकार नहीं करेंगे कि वो बात जो ट्रंप कह रहा है, वो बात कहीं न कहीं करोड़ों लोगों के मन में ह, ये जहर जो मोदी जी इस देश में फैला रहे हैं, ये झूठ जो आर एस एस ने इस देश के बारे में चलाया है, वो कहीं न कहीं करोड़ों भारतीयों के मन तक पहुंचा है। और जब तक आप उसकी सफाई नहीं करेंगे तब तक आप बी जे पी को हरा नहीं सकते। या हरा भी दिया तो वो बहुत अच्छी जीत होगी आपकी। और वो लड़ने के लिए, वो लड़ाई लड़ने के लिए, आपको पुराने औजार काम नहीं देंगे, आपको नए औजार लाने होंगे, ये नए औजार क्या होंगे सर? क्योंकि अगर हम देखें तो केंद्र में बीजेपी की सरकार तो खैर है ही, डेली बहुत सारे राज्यों में भी उन्हीं की सरकार है और जिन राज्यों में नहीं भी है, तो कहीं न कहीं समर्थन में उनकी सरका कुछ चुनिंदा। गिनती के 45 राज्य ऐसे रह गए हैं, जहाँ पर क्षेत्रीय पार्टियों ने अपना वर्चस्व स्थिल कायम रखा है। लेकिन वो भी आखिरी सांस ले रहे हैं। ठीक है यूपी 1 मतलब अचानक से ये कह सकते हैं कि अनएक्सपेक्टेड रहा कि लोकसभा में 38 सीटें समाजवादी पार्टी को आ गई तो 1 दिखाई देने लगा, कांग्रेस बहुत आगे नहीं बढ़ी। अपने पुराने प्रदर्शनों से। ठीक है डबल हुआ। लेकिन ये कांग्रेस का इतिहास नहीं है। मैं आपसे समझना चाहता हूँ कि जिस डर के बारे में आप बात कर रहे हैं और जो सच्चाई आप बता रहे हैं कि जो विचार की आइडियोलॉजी वो आम गाँव में रहने वाली 1 बुजुर्ग तक भी पहुँच गई है, उससे कैसे बचना है? क्या नए औजार इस्तेमाल करने पड़े जी, अभी मैं चुनावी चर्चा नहीं करूंगा, विचार पे ही विचार पे ही हम रहेंगे। यह मानना कि चूंकि इनकी इतनी सरकारें हैं, इसलिए इनका मुकाबला नहीं हो सकता। ये तो बिल्कुल तर्कहीन बात है। क्यूंकि? अगर ये होता तो कांग्रेस की कितनी सरकारें थी? इनकी तो 57 राज्यों में नहीं है। कांग्रेस की तो सब में हुआ करती थी। 50 के दशक में जा के फाइनल के में, सावन में सरकार बनी थी, 21 साल के लिए, वो भी टूट गयी थी। तो इस लिहाज से तो कांग्रेस के खिलाफ कभी कुछ हो ही नहीं सकता था। हुआ न इस देश में कांग्रेस को भी छोड़ दीजिए, अंग्रेजों ने भी राज किया, न इस देश में, उस अंग्रेजों को भी उखाड़ के फेंक दिया, न इस देश की जनता ने। ये किस खेत की मूली है, कितने साल है, कितने साल? और किस तरीके से वही है कांग्रेस। पंद्रह 20 साल में 67 आते आते। कांग्रेस का तो शुरू हो गया था। पंद्रह साल हुए, 11 साल इनके हो गए हैं और 14 वर्ष का वनवास भारत की जनता को शायद मिला है, उसको सर झुका कर स्वीकार करना चाहिए। 14 वर्ष बाद जब वापसी होगी, जनता की किसी 1 नेता से मेर को कोई लेना देना नहीं है। इस संविधान की, स्वधर्म की, इस देश की वनवास के बाद वापसी होगी। आप इस सभ्यता को इतना छोटा न समझिए की 1 कोई 10 पंद्रह साल किसी के चक्कर में आ के और पूरा देश पगला जाएगा। ऐसा कुछ नहीं होगा। बहुत गहरी सभ्यता है हमारी, बहुत गहरे संस्कार है हमारे जरूर बीच बीच में नफरत का 1 आता है दौर। लेकिन उसके लिए जो आपका प्रश्न था कि उसके संसाधन कहाँ से आएंगे, वो संसाधन लेने के लिए मुझे किसी बाहर की परंपरा में जाने की कोई जरूरत नहीं है। और इस किताब का यही 1 आग्रह है कि हमारे अपने सभ्यता में इतने औजार मैं इस स्वधर्म के 4 स्तंभ परिभाषित करता हूँ। हम कहते हैं ये जो जिसे आज सेकुलरिज्म कहा जाता है। इसकी बुनियाद किस च चीज में मैत्री मैत्री का विचार कब आया, ये तो बुद्ध के समय से चला रहे हैं। मित्र, मैथ्री, अशोक, अकबर, ये सब क्या कर रहे हैं, वही कर रहे हैं जिसको आज हम सेकुलरिज्म बोलते हैं। ये जो समता का विचार है, इसके मूल में क्या है, करूणा बाद में रहे। ये सूफी लोग क्या कह रहे हैं, ये भक्ति के संत क्या कह रहे हैं? वही जिसको बाद में समाजवादी, सोशलिस्ट शब्द कह कर कहना शुरू कर दिया। शब्द बदल गए हैं। भावना इस देश में पुरानी है। ये जो आज जिसे हम लोकतंत्र कहते हैं। आप बिना पिटिका देखिये बुद्ध के जमाने की जो पूरी संघता है, कहा, वोट कैसे होना चाहिए, कोरम क्या होना चाहिए, जूनियर और सीनियर व्यक्ति को बराबर वोट होना चाहिए। शब्द तब लिखा हुआ है। भाई इस देश की पुरानी परंपराओं में है। यह जो संघ का विचार है, फेडरेशन शब्द का भले इस्तेमाल न हुआ हो। लेकिन ये जो देशाचार का विचार है, यह तो बहुत बुनियादी विचार इस देश का है। तो मेरा कहना यह है कि इसके लिए हमारी जो कमजोरी रही है, वो ये की हमने इस देश के संस्कार, संस्कृति, मुहावरे, इनसे अपना संबंध तोड़ दिया। संविधान के जो रक्षक लोग थे, वो 1 ऐसी भाषा का इस्तेमाल करने लगे, जो भाषा इस देश के लोगों को बड़ी, अजीब, रपटी, सी भाषा लगती थी। ये लुटेंस, डेली और खान, मार्केट की बात भले ही अतिश्योक्ति हो, लेकिन यह बात तो सच है कि इस देश में जो पहले 50 साल में जो लोग राज कर रहे थे, उनकी भाषा, संस्कृति, संस्कार, इस देश की आम जनता से मेल नहीं खाते थे। और जरूरत थी ये गलती गांधी ने कभी नहीं की, लेकिन बाकियों ने की, उसके बाद वाले लोगों ने किया। इसलिए आपको अगर इस देश के संविधान की, इस देश की, आत्मा की, इस देश के स्वधर्म की रक्षा करनी है तो आपको उस भाषा, संस्कृति, संस्कार में डूबना होगा जहाँ से इस देश की रचना हुई है। और यही काम 1 किताब अपने तरीके से, छोटे तरीके से अनगढ़ तरीके से कर रही है। मैं अगले सवाल पर, किताब से जुड़े सवाल पर जाने से पहले जिसमें अपने देश काल पत्र का जिक्र किया है। लेकिन मैं यह समझना चाहता हूँ, जवाब दे रहे थे कि 1 दिन कांग्रेस का जो दौर था वो 17, 18 साल बाद आजादी के खत्म हो गया, इनका 11 साल हो गया। कुछ यह थोड़ा सा थकाऊ सा फील नहीं कराता है, थकाऊ जवाब की मतलब ठीक है, अब इनका भी वो दौर खत्म हो जाएगा तो हट ही जाएंगे। नहीं मैं। बिल्कुल पहली बात तो थकाऊ है न, ये है की अपने आप हो जाएगा, कुछ नहीं होगा, आपको कुछ करना पड़ता है। कांग्रेस अपने आप नहीं गयी थी, पता नहीं कितने समाजवादियों ने, कितने साम्यवादियों ने, कितने जनसंघियों ने अपनी जिंदगी इस काम में लगाई थी। तो ये तो हमेशा प्रयास से होता है। और ये तो मैं कभी भी नहीं कहता की अपने आप हो जाएगा, अपने कुछ होगा। या आपको दिखाई दे रहे हैं कांग्रेस का खासकर वो जरूरी नहीं पार्टियों का प्रयास समाज का प्रयास होता है। हमारे इस देश में अभी भी इतना 2 चीज देखी। याद रखिये भारत जो है वो पुतिन का रूस नहीं है। क्योंकि पुतिन के रूस में सिर्फ पुतिन के पास डंडा नहीं था, उससे पहले भी 70 साल वहां लोकतंत्र नहीं था। वहाँ के लोगों को आदत नहीं है लोंत्रजबआपउसका लोकतंत्र समाप्त कर देते हैं। तो लोगों को यह महसूस नहीं होता कि ये चीज मेरे पास थी जो चली गई। भारत में लोगों को आदत है, लोगों ने बड़े बड़े लोगों का कान पकड़ कर कुर्सी से उतारा है। और शासक लोगों का अहंकार हो ये बर्दाश्त नहीं होता। लोगों को। तो पहली बात हमारे लोकतंत्र की आदत है। लोगों को इसको मत भूलिए और उन्हें पता न लगे आप उनका लोकतंत्र ले ले तो हो जाता है। लेकिन जिस दिन लग गया की ये कर रहे हैं, देखिये मैं इमरजेंसी का बच्चा हूँ, मैं 13, 14 साल का तो 13 साल का था, मैंने इमरजेंसी देखी है और 14 साल का था। मैंने इमरजेंसी उतरते भी देखी है, उभार भी देखा है और उस उभार का उतार भी देखा है। जब लोगों को लगा बाप रे ये कर रही थी इंदिरा गांधी, उस वक्त जो हुआ आप कल्पना नहीं कर सकते, क्या अद्भुत काम हुए थे उस वक्त तो 1 तो ये भूलिए मत इस देश के बा दूसरा, ये जो दिल्ली और बड़े शहर के ड्राइंग रूम के अंदर जो चर्चा होती है, आज कल जो छोटे छोटे वाट्सएप्प, ग्रुप के ऊपर, नफरत के जो मैसेज आते हैं, ये देश वो नहीं है, देश बहुत बड़ा है, देश में आप पैदल चलिए जो मैं चला। तो मुझे लगा कि हाँ, पूरा देश पगलाया नहीं है। अभी मतलब कुछ हिस्सों में इनका जहर पहु जहर पूरे देश में नहीं पहुँचा है। और अंतत अगर आप इस देश की भाषा संस्कार से जुड़ते हैं। जैसे कुछ क्षण के लिए लगा था भारत जोड़ो यात्रा में 1 समय के लिए लगा की ये तो हो गया। और आपने देखा उस 1 यात्रा में कितना कर दिया था। अब उसके बाद वो काम हुआ, नहीं हुआ, अलग चीज़ है। लेकिन ये दिखाता है कि इस देश में कुछ है। ये देश खत्म नहीं हुआ है, प्रयास हो रहे हैं। जरूरी नहीं कि सारे प्रयास, सबसे विजिबल पार्टी या नेता की तरफ से। आए नेता आंदोलन खड़े करते हैं, लेकिन आंदोलन भी नेता खड़े करते हैं। वो सब भी होता है। तो मुझे वैसे मैं आस्थावान व्यक्ति नहीं हूँ। इस मायने में कि किसी मंदिर, मस्जिद को द्वारे जाके। मैं तो हाथ नहीं जोड़ता। मैं तो इन सब चीजों से दूर रहता हूँ। लेकिन पता नहीं क्यों मुझे इस मिट्टी में मेरी आस्था है, इस देश में आस्था है, हमारी सभ्यता में मेरी आस्था है और हिंदुस्तान के 1 औसत इंसान में मेरी आस्था है। इसे आप आस्था कह सकते हैं, लेकिन वो है और आप देखना, आप भी यहीं है। मैं भी यही हू। हो सकता है, मैं न रहूं, लेकिन आप रहेंगे। जिस दिन पलटेगा न, आप भी मुंह में उंगली डालेंगे, बाप रे। ये मैंने नहीं सोचा था कि कभी ऐसा भी होगा। मैंने ऐसा होते हुए अपने जीवन में देखा है और मैं शायद नहीं तो आप जरूर देखेंगे, ठीक सर। मैं उम्मीद करूंगा आपने अपनी किताब में देश, काल पत्र की जो अवधारणा दी है, उसमें देश को आपने सिर्फ भूगोल नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व की संरचना के रूप में देखा है। खासतौर पर परिसीमन से इसे जोड़ा है। सवाल है कि क्या यह प्रस्ताव भारत के संघीय ढांचे में संतुलन को बिगाड़ सकता है? और क्या वन, पर्सन, वन वोट के सिद्धांत के नाम पर क्षेत्र समानता बढ़ाने का मुख्य कारण हो सकता है? जो आपने देश, काल पात्र वाली बात कहीं, वो 1 बहुत साधारण सी अवधारणा मैंने रखी है। मैंने कहा है कि बीजेपी जो अलग अलग चीजें कर रही है, जिसे हम अलग अलग टुकड़े में देखते हैं। अरे एस आई आर आ गया, अब 24 दिन से चल रहा है, डीलिमिटेशन आ गया। फिर ये वन नेशन, वन इलेक्शन मैंने कहा कि सब अलग अलग टुकड़े नहीं, तीनों सब टुकड़ों को जोड़ के। देखिये। ये 1 संरचना ह। और यह संरचना क्या है भारत के लोकतंत्र को 1 उसका जो जमीन है, उसका ढाल बदलने की संरचना है। देश, काल और पात्र। 3 चीजें होती है भारत के लोकतंत्र के देश, काल और पात्र बदलने का षड़यंत्र है। देश का मतलब, यहाँ पर है क्षेत्र, देश का वैसे भी मतलब यही होता है। आजकल हम केवल राष्ट्र के अर्थ में संबंधा शुरू करती। जब कोई दिल्ली से जाता है, कहता है, मैं अपने देश जा रहा हूँ, जब बिहार जाता है, यूपी जाता है देश का मतलब क्षेत्र। इस ऐसे कुछ क्षेत्र हैं इस देश में, जो बीजेपी के लिए मुफीद नहीं। तो किसी ने बीजेपी हेडक्वार्टर में सोचा होगा कि कोई ऐसा तरीका हो सकता है कि इनकी सीटें कम हो जाए। भारत से तो निकाल नहीं सकते, सीटे कम हो जाए। इनकी दूसरा। इस देश के कई लोग हैं जो बीजेपी को वोट नहीं देते, कई समुदाय हैं इनका वोट काटने का कोई तरीका हो सकता है। तीसरा कि कुछ ऐसे कैलेंडर है हर 68 महीने में चुनाव हो जाता है, झंझट हो जाता है। फिर मोदी जी को जवाब देना प पड़ता है। जनता को कुछ कंसेशन देने पड़ते हैं। यह टंटा 5 साल में 1 ही बार हो, बार बार करना न पड़े। ऐसा तरीका नहीं हो सकता। तो जिसने भी सोचा होगा, मैं नहीं जानता किसने सोचा होगा की जेपी हेडक्वर्टर में कहीं बैठा होगा। और उसने सोच कर कहा होगा कि चलिए तीनों का हम उपाय करते हैं, तो पात्र का उपाय है एस आई आर, काल का उपाय है वन नेशन, वन इलेक्शन और देश का उपाय है डीलिमिटेशन। तो आप दीर्घ काल में लोकतंत्र की संरचना ऐसी कर दे कि कुल मिला के बीजेपी के पक्ष में रहे। बीजेपी 1 तरह से पर्मानेंट मेजोरिटी में रहे। इक्कीसवीं सदी में जो डिक्टेटर है, उनकी समस्या क्या है, उन बेचारों को चुनाव करवाना पड़ता है। बीसवी सदी में ऐसी कोई प्रॉब्लम नहीं थी। रिक्टर कहता था, कल से, खत्म मार्शल, लॉ सेंसरशिप इक्कीसवी सदी में ढोंग करना पड़ता है। आपको चुनाव भी करवाना पड़ता है। तो आप कैसे करें कि मैच भी हो, अम्पायर भी खड़ा हो। लेकिन मेरी टीम जीते, हर बार तो उसके लिए आप क्या करेंगे पिच। बदलेंगे अम्पायर अपनी टीम के आदमी को, ड्रेस, पहना के वाइट कोर्ट, क के, अपनी टीम के आदमी को एम्पायर खड़ा कर देंगे। आप बॉल बदलेंगे, आप बाउंड्री की शेप भी बदलेंगे, वो सब कुछ करेंगे। वही हो रहा है इस देश में, तो अंतत यह देश लोकतंत्र का, देश, काल और पात्र तीनों बदलने का खेल हो रहा है। ये जो डिलिमिटेशन है यह कुल मिला के खेल यह है कि जिन इलाकों में बीजेपी अपेक्षाकृत कमजोर है, जहाँ जीत कभी कभार जाती है, लेकिन सुनिश्चित नहीं है, उनकी सीटें कम कर दी जाए। अब आप देख लीजिये डिलिमिटेशन में किसको नुकसान होगा। तमिलनाडु, केरला, कर्नाटक, आंध्रा, तेलंगाना, बंगाल, ओडिशा, पंजाब, ये कौन से राज्य है। अब। हालांकि बीजेपी कह रही है कि नहीं नहीं, हम तो ये कर देंगे। क्योंकि अभी भी बीजेपी को इन इलाकों में पंत तो वोट लेने हैं इन सब को छोड़ के। तो आप भारत पे राज कर नहीं सकते तो। लेकिन खेल ही था को कमजोर करने वाली बात होगी, स्टेट का भरोसा नहीं रहोगा। इसमें कई लोग कहते हैं कि देखिये इसमें क्या बुरी बात है। अंतत तो आपको 1 व्यक्ति का 1 वोट होना ही चाहिए। हम इस बात से लोकतंत्र का बुनियादी नियम यह है। इसमें मेरी कोई असहमति नहीं है की हर व्यक्ति के वोट का बराबर वजन होना चाहिए। इसलिए अगर कोई कहता कि भाई आपको जनसंख्या के हिसाब से सीटें बदली हैं, तो पहली नजर में आप ये कह सकते थे कि हाँ भाई, ये बात तो लगती है, लेकिन यहाँ 1 दूसरा सिद्धांत है, यह है कि भारत 1 कुनबा है? 1 परिवार है, परिवार में, आपको सबको साथ लेके चलना है। आप ये नहीं कर सकते कि मेरी ऐसी चल रही है। मैं चलाऊंगा बड़ा भाई हूँ, ऐसे करूंगा नहीं। आपको सबको साथ लेके चलना है। और कहीं न कहीं भारत के संघीय ढांचे में 1 अलिखित समझौता है, इसे हम अनुबंध कह सकते हैं। 1 अलिखित अनुबंध है। और वो ये है कि कोई किसी पे वर्चस्व अपना नहीं बनाएगा, किसी का बोलबाला नहीं होगा, किसी की दादागिरी नहीं होगी और वो अनुबंध टूट जाएगा। अगर दक्षिण भारत या गैर हिंदी भाषी प्रदेशों की सीटें कम कर दी जाए, किसी न किसी फार्मूले से अगर कम कर दी जाए, तो कहीं न कहीं वो अनुबंध टूटेगा। और इसलिए मैं कह रहा हूँ कि ये भले ही तकनीकी रूप से सही हो, भले ही पहली नजर में लगे कि लोकतांत्रिक तरीके से किया जा रहा है, लेकिन यह राष्ट्र हित में नहीं है। और इतने बड़े फैसले लेते, वक्त आपको अगले चुनाव का नहीं सोचना चाहिए, आपको अगले 50 साल सौ साल का सोचना चाहिए और अगले 50 सौ साल की सोचेंगे, तो आप पाएंगे कि ये देश के हित में नहीं है। इस तरह के काम क? हमें भारत रूपी, इस माला को, इस परिवार को बचा के रखना है, जोड़ के रखना है, किसी में अलगाव की भावना न पैदा हो, यह सुनिश्चित करना हमारा काम है। इसलिए मैं कहता हूँ कि इस तरह का डि लिमिटेशन नहीं होना चाहिए। सर मैं आप से जानना चाहता हूं कि यदि मोदी सरकार आने वाले कुछ समय में या अगले चुनाव तक कुछ ऐसा कर दे कि वन नेशन, वन इलेक्शन को लागू कर दे, इन्हीं परिस्थितियों में भी तो इसके फायदे और इसके नुकसान क्या होंगे? और चिंता क्या है? हमारे देश में? दरअसल राजनीतिक सुधार के सवाल पर इतने विचित्र और अनर्गल किस्म की चर्चा होती है। वैसे मैं आपको बताऊं कोई कहे की? देखिये, दिल्ली में जमना पार जाने के लिए आई टी ओ पर काफी ट्रैफिक जैम होता है। यह तो बड़ी भारी समस्या है। इसके लिए कुछ करने की जरुरत है। आप कहेंगे? हाँ, समस्या तो है। चलो तो आप पुल को डबल कर चौड़ा कर दीजिये, कोई कहेगा नहीं, 1 नया पुल बना दीजिए, फिर कोई ज्यादा समझदार आदमी, आएगा वो कहेगा? हम जमुना का रास्ता क्यों नहीं बदल देते? क्योंकि वो दिल्ली के दूसरी तरफ से निकल जाए। आप कहेंगे भाई, वो सब ठीक है। इस तरह की बात न करो। मतलब इतनी लंबी, मत फेंको की, जमुना का रास्ता बदल। 2 ताकि दिल्ली का ट्रैफिक ठीक हो। ये जो वन नेशन, वन इलेक्शन है, एग्जैक्ट ली, वही मामला है। समस्या क्या बताते हैं कि देखिए, चुनाव बार बार होते हैं, बार बार चुनाव होते हैं, तो देश का। सरकार का काम में विघ्न पड़ता रहता है। तो आप कहेंगे ठीक है? अगर ऐसा है तो इसके कई तरीके हैं। ऐसा करो की चुनाव के दौरान सरकार घोषणाएं बड़ी कर सके, इसके लिए पाबंदी नहीं होनी चाहिए। उस राज्य से सम्बंधित नहीं है। तो तो हकीकत है की पाबंदी है ही नहीं। आप खुद देख लीजिये, अभी सरकार चुनाव चल रहे हैं, सरकार क्या घोषणा नहीं कर रही है, सब कुछ हो रहा है। एग्जाम था, इस वक्त तमिलनाडु बंगाल का चुनाव चल रहा है, और पूरे देश में महिला आरक्षण के लिए विशेष सत्र बुलाया गया है। क्या पाबंदी है, अगर पाबंदी है। आप इसमें छूट और सोच सकते हैं कि चलिए ये भी छूट दे दीजिए, वो भी छूट दे दीजिये। मगर उसके लिए आपको कहा जाए कि आप ऐसा करें। इस पूरे देश के लोकतंत्र का स्वरुप बदल दे। याद रखिये जो 15 साल में 1 बार चुनाव हो। यह केवल 1 एडमिनिस्ट्रेटिव और कैलेंडर का मामला नहीं है। यह हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था को बदलने का मामला है। क्यों? क्योंकि हमारे यहाँ संसदीय लोकतंत्र है, राष्ट्रपति व्यवस्था नहीं। संसदीय लोकतंत्र का मतलब नहीं होता। कि जहाँ जहाँ संसद अमेरिका में भी संसद है, लेकिन अमेरिका में संसदीय व्यवस्था नहीं है। संसदीय व्यवस्था का मतलब होता है। 1 ऐसा देश जहाँ संसद अपना प्रधानमंत्री या जो भी अपना प्रमुख चुनती है। और सरकार को संसद का विश्वास जब तक प्राप्त है, तब तक चल सकती है। अब आप भारत में लोग सोचते हैं तो होता ही है, ऐसा नहीं होता। दुनिया में ट्रंप के पास संसद में बहुमत है या नहीं है, उससे कोई फर्क नहीं पड़ता, वो 4 साल के लिए बनाए 4 साल तक ही रहेगा। चाहे वहाँ की संसद उसके विधेयक को पारित करे या न करे। उसको राष्ट्रपति व्यवस्था बोला जाता है। संसदीय व्यवस्था की 1 बुनियादी शर्त यह होती है कि जब प्रधानमंत्री या उसे जो भी चीफ, मिनिस्टर कुछ भी नाम दीजिये, अगर सदन का विश्वास उसे हासिल नहीं हो तो सरकार उस दिन गिर जाती है। जैसे अटल जी की सरकार गिरी थी। राज्यों में कई बार ऐसा होता रहता है। इसका मतलब यह है की संसदीय व्यवस्था में कभी भी आप फिक्स कलेंडर नहीं कर सकते की चुनाव एग्जेक्टली तभी होंगे। सन 1900 पिचासी में 84 में चुनाव हुए, नवासी में हुए, उसके बाद कब हुए, इक्यानवे में हो गया, क्यूंकी सरकार गिर गयी, इक्यानवे के बाद 96 में हुए, ठीक है, 96 के बाद कब हुए, अठानवे में हो गए, 98 के बाद 99 में दोबारा हो गए। यह संसदीय व्यवस्था का दोष नहीं है, संसदीय व्यवस्था की प्रकृति है। जिस दिन आपने 1 ऐसी व्यवस्था कर दी कि देखिये ये फिक्स टर्म है, जिसका मतलब है कि प्रधानमंत्री तो आप है, लेकिन आपको संसद में बहुमत प्राप्त नहीं है तो क्या होगा? आप बजट पास नहीं करवा सक प्रधानमंत्री हैं, देश चला रहे हैं, बजट पास नहीं करवा सकते। कैसे देश चलेगा मतलब आप आई टी ओ का ट्रैफिक ठीक करने के लिए आप पूरी जमना को कह रहे हैं। जमना जी का रास्ता बदल। 2 तो 1 छोटी समस्या को समाप्त करने के लिए आप 1 बड़ी मुसीबत को उड़ रहे हैं और लोग ताली बजा रहे हैं की वह कि कितना यूनिक विचार है, क्या ओरिजनल विचार लेके। आ तर्क दिया जाता है कि बहुत ज्यादा खर्चा होता है। 2019 में आई थिंक 60 हजार करोड़ रूपए खर्च हो गए थे, 2024 में 1 दशमलव 35 लाख करोड़ रूपये खर्च पहुंच गया। इस हिसाब से 2029 में तो 2 लाख करोड़ हो जाएगा। मैं तर जी बात करो। 1 तो यह आधिकारिक आंकड़े नहीं है। यह अनुमान है। जिस अनुमान में तमाम कैंडिडेट ने और पार्टियों ने जितना खर्च किया गया होगा, उसका अनुमान है। जो आधिकारिक खर्च है। सरकार का वो 7, 8000 करोड़ रूपए है। याद रहे 1951 से 1900 सड़सठ तक जो इलेक्शन सरकारी आंकड़े जो है, वो सरकार का जो खर्च है, वो सीमित होता है। और ये याद रखिये हम जैसे क्या होता। हम साधारण लोगों के लिए। कोई भी आदमी जब 50 लाख बोलता है, मुझे समझ आता है, 1 करोड़ तक समझ आता है, जब 10 करोड़ बोलता है। मुझे लगता है हाँ शायद मैं देख पा रहा हूँ। 10 करोड़ और 10 हजार करोड़ में। अंतर पता नहीं लगता क्यूंकि? उसके बाद चीज ऐसी है जो सब आंकड़े हैं, बहुत बड़ा है। पर इलेक्शन महंगा तो हुआ है। सर तो दिक्कत, ये है। याद रखिए, ये सब होने पर भी इलेक्शन होगा। इलेक्शन इस देश में खत्म नहीं हो रहा। जी केवल इतना होगा कि विधान सभा और लोकसभा का कलेक्शन अलग अलग होने के बजाय 1 बराबर होगा। 1 साथ 1 दिन होगा। 1 दिन करने से यह जरूर है कि खर्चा 2 गुना नहीं होगा, कोई डेढ़ गुना, 2 गुना होगा। यह नहीं होगा कि खर्चा मतलब एकदम आधा हो जाएगा। क्योंकि याद रखिये वो एमएलए का कैंडिडेट भी है, एम पी का कैंडिडेट भी हैं। और ज्यादातर खर्चा वो कैंडिडेट कर रहे होते हैं। भारत सरकार का खर्चा तो बहुत छोटा होता है। आपने बताया इसका दसवाँ हिस्सा भी भारत सरकार का खर्चा नहीं है। यह खर्चा कैंडिडेट द्वारा किया गया है। और कैंडिडेट तो मेले वाला भी करेगा और एमपी वाला भी खर्च करेगा। अगर साड़ी बांटेगा तो मेले वाला भी बांटेगा और एमपी वाला भी बंटेगा। मगर मान लीजिये की ये सारा खर्चा अगर 200 रूपया खर्च होता तो सौ रुपये पहले और सौ रुपए एमपी वाले इलेक्शन में तो 200 के बजाय डेढ़ सौ रूपए खर्च होगा। ऐसा सम्भव है। 50 रुपए की बचत हो जाएगी। अब सवाल ये है की ये जो बचत है, क्या ये बचत इस लायक है कि हम पूरे देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को बदल देंगे। क्योंकि इस तर्क के हिसाब से कोई और समझदार आदमी आयेगा, वो कहेगा कि 10 साल में 1 बार करवा लो न, उससे तो बहुत ही बचत हो जाएगी। फिर कोई और समझदार आदमी आयेगा, वो कहेगा कि 70 साल के लिए फिट कर 2 न, 1 बार में तो चुनाव लोकतंत्र का क्या दाम लगाए, इसके बारे में थोड़ा सोच कर बोलना चाहिए। हमें। और याद रखिये साधारण बात ये जो 5000 करोड़ रुपया, 10 हजार करोड़ रूपया, ये न इस देश में डिफेंस डील में, 1 डिफेंस डील में जितनी रिश्वत ली जाती है, वो 10 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा होती है। 1 डिफेंस डील में। तो अगर आप अपने लोकतंत्र को बेहतर बना सके बार बार चुनाव करके भी तो ये 5010 हजार करोड़ रूपया कुछ भी नहीं है। लोकतंत्र के लिए खामखा हमलोग एक्साइटेड हो जाते है। इन फिगर्स को सुनत अगर ऐसा लोकतंत्र ज्यादा जवाब दें। लोकतंत्र अगर किसी तरह। से बन सके और उसमे अगर मेरे 20 हजार करोड़ रूपए एक्सट्रा खर्च हो जाए। तो 20 हजार करोड़ रूपए इस देश के लिए कुछ भी नहीं है। याद रखिए इस देश का बजट 50 लाख करोड़ रूपए का है। अगर उस 50 लाख करोड़ रूपए में 1 प्रतिशत का फायदा हो सकता है, 1 प्रतिशत ठीक हो सकता है तो वो 50 हजार करोड़ रूपए बनते हैं। 1 प्रतिशत। तो घबराइए मत आंकड़ों को देख के। तो इलेक्शन का कितना खर्च होता है। यह बहुत ही बेतुकी सी बहस होती है। इस तरह की बेतुकी बहस से बचना चाहिए। क्योंकि बहस अंतत हमें उस दिशा में ले जाएगी की इलेक्शन करवाएगी न। तो कितना पैसा बच जाएगा इस देश का। क्योंकि इस देश में काफी समय से 1 राजनीति को सुधारने के नाम पर राजनीति विरोध चलता रहता है। क्योंकि मूलत इस देश का 1 वर्ग है, जो चाहता है कि लोकतंत्र के टंटे से मुक्ति पाई जाए। वो सुन्दर सुंदर तर्क गढ़ता है, कहता है, डिले होता है, वो, कभी कभी चीन की तरफ देखता है, वो कभी कहता है। जरूरत से ज्यादा इंडिपेंडेंट। कैंडिडेट आ गए है, ऐसी तमाम चीजें। कह यह दरअसल राजनीति को सुधार करने के तरीके नहीं हैं। लोकतंत्र को बंद करने के तरीके। तो राजनीति को सुधार करते वक्त इसका ध्यान रखना चाहिए। और मुझे लगता है ये जो वन नेशन, वन इलेक्शन का जो पूरा मॉडल है, वो पहले तो इसे उसके पीछे नीयत बड़ी साधारण सी है, फिर बहुत छोटे से फायदे के लिए न। तो नियत इसमें ये जो आईटीओ का पुल ठीक करने की है, न नीयत जमुना जी का रास्ता बदलने की है, नियत ठेकेदार। जिसको ठेका मिलेगा उस ठेके के पैसे की नियत है। यह सारा खेल किसलिए किया जा रहा है वन नेशन, वन इलेक्शन का। क्योंकि अगर चुनाव दोनों 1 साथ हो होते हैं तो राष्ट्रीय पार्टी को हमेशा डेढ़ 2 प्रतिशत का एडवांटेज मिलेगा। जिस दिन मान लीजिये, उडिसा में चुनाव हुआ, 1 ही दिन चुनाव हुआ। उड़ीसा में बीजेपी, लोकसभा में तो पूरा स्वीप कर गई और विधानसभा में मेजोरिटी ले गई। यह संभव नहीं था। अगर ओडिशा में लोकसभा और विधानसभा चुनाव 2 अलग दिन में हु। लोकसभा में बीजेपी जीतती, विधानसभा में बीजेपी वापिस आ जाती, वो डेढ़ 2 प्रतिशत का मामला था, जिसके अंदर चपेट लग गई। यह सारा खेल इसलिए है कि बीजेपी को लगता है कि अगर 1 साथ चुनाव होंगे तो हमारा डेढ़ 2 प्रतिशत वोट बढ़ जाएगा सिर्फ। उसके लिए पूरा जमनाजी का रास्ता बदला जा रहा है। फ यहाँ पर 1 सवाल आता है कि कितने सालों के लिए आपको? ऐसा विश्वास कितने सालों के लिए है कि ये जो 12 प्रतिशत बढ़ा के अगर आपके पास वोट आ जाते है, तो कितने साल तक आप? देश में सत्ता समाज पता नहीं। लेकिन मैं समझता हूँ जो आज लोग सत्ता में हैं, बीजेपी वाले, इनका, इनकी बुद्धि अगले 5 10 साल से फालतू देख नहीं पा रही। अगला चुनाव जीतने के लिए कुछ भी करना पड़ जाए, बस न कर लो। और मैं समझता हूँ ये लोग इतने फंस गए हैं। इस वक्त, क्योंकि याद रखिये, जो सर्वशक्तिमान दिखाई देता है, वो भी अंदर से बड़ा मजबूर इंसान होता है। ये जो है, ये, इस वक्त बीजेपी, मोदी जी, स्वयं। और यह जो पूरा सत्ता का तंत्र है, ये इस वक्त अपने आर्थिक हितों में इतना बंध चुका है। चारों तरफ इनके नकेल है, छोटे कॉन्ट्रेक्टर, बड़े कॉन्ट्रेक्टर, और फिर वो, ए, वन और टू। यह ए, वन और टू का जो चक्कर है। ये सरकार को इस वक्त इतना बांध चुका है कि अगर ये चाहे तब भी कुर्सी नहीं छोड़ सकते, चाहेंगे नहीं, लेकिन अगर कल को मान लीजिये, हंगरी जैसा हो जाए। अब हंगरी में क्या हुआ? 2 दिन पहले जो सोचते थे, वो कहते हैं, इससे पहले भी जो कुर्सी तक नशी था, उसे भी अपने खुदा होने का यकीन था। तो ये अरमान साहब मानते थे कि ये तो मतलब 16 साल से राज कर रहे हैं, कभी नहीं जायेंगे। 1 मौका मिला, जनता ने कान पकड़ा और नीचे उतार दी। अब अरमान साहब को कुर्सी छोड़नी पड़ी। शायद उन्होंने सोचा भी नहीं था कि ऐसी हो सकती है। शायद। 1 झटके में हो गया, मामला कल को मान लीजिये, ऐसा इस देश में हो जाए और होगा। जरूर। मैं पूरे विश्वास से कहता हूँ, ये रिकॉर्डिंग रहेगी। आप देखना, यह होगा इस देश में मगर क्या। अगर ऐसी स्थिति बनती है तो बीजेपी में आज ये इनकी स्थिति बची है कि चुपचाप से कुर्सी छोड़ के चले जाएंगे। मैं समझता हूँ, अब इनकी स्थिति नहीं बची है। क्योंकि इतना कुछ छुपा छुपाने को है, इतना कुछ दबाने को है। नई सरकार, आएगी, पीएम को खोलेगी, पहले नई सरकार आएगी, हो सकता एपस्टीन फाइल की कुछ चीजें आई, पड़ी हो नई सरकार, आएगी, अडानी का कॉन्ट्रेक्ट खुलेगी, सारा का सारा, नई सरकार। आएगी देखेगी कि रशियन ऑयल किस कंपनी के पास आया था, उसको कितना पैसा मिला। जब उसको पैसा मिल रहा था तो हिंदुस्तान में पेट्रोल का दाम कम क्यों नहीं हुआ? ये सब सवाल पूछेगी, उसके बाद क्या होगा? यह भय सताता है। और इसलिए अब ये भी बेचारे मजबूरी के मारे अपने इर्द गिर्द दीवार बनाना चाहते हैं। हमेशा मेज बचाने के इमेज बचाने का डर, सप्ताह को किसी भी तरह से बचा सकने का डर और दुनिया भर के डिक्टेटर इसी तरह गिरते हैं, अंतत गिर जाते हैं और अपने इर्द गिर दीवार बनाना शुरू करत। और 1 दिन वो दीवार उनके लिए जेल बन जाती है, वो कुंआ बन जाता है, जिसके अंदर वो डूब जाते हैं। ये हो रहा है। उनके साथ 1 नजरिया और टिप्पणी आपकी चाहूँगा। ये जो 50 दिन से ईरान, इजरायल और अमेरिका की जो लड़ाई चल रही है। इसी बीच में 1 महीने पहले ये खबर थी कि भारत को ग्रांट मिला है 30 दिन का कि आप यहां रूस और इरान से अपना विरोध का सामान खरीद सकते हैं। खासकर पेट्रोल, डीजल, पी, जी, सी, एन, जी, सब चीज वो आज ही की खबर है, आज की है, या कल आज की खबर है। शायद वो दिन पूरा हो गया। अब कहा गया है कि आप नहीं खरीद सकते। रूस और इरान से जो भी इंटरनेशनल बॉर्डर, हार्मोस को लेकर के तमाम चीजें चल रही हैं, सर आप इसे कैसे देख रहे हैं। आपने अंग्रेजी का शब्द इस्तेमाल किया, ग्रांट। इसका हिंदी का सही अनुवाद होता है। मोहल्लत मोहल्लत। अमेरिका ने भारत को मोहल्लत दी है कि जाओ 1 महीने तक तुम चाहो तो अपने पडोसी से तेल खरीद लेना। उसके बाद नहीं है धान से, उसके बाद से दोबारा लाइन पे आ जाना। और इसे हिंदुस्तान के विदेश मंत्री और हिंदुस्तान के इनका डमरू बजाने वाले कहते हैं कि वाह वाह, वाह। साहब ने मोहलत दे दी, साहब ने मोहलत दे दी, इसके डुगडुगी पीटते हैं। क्या स्थिति हो गयी है इस देश की। आप बताइए। पहले कभी ऐसा हुआ था की कोई दूसरा देश भारत को ये कहे की तुम अपना दाल चावल कहाँ से खरीदोगे। मैं। आपको बता सके हम तय करेंगे। मैं बताऊँ आपको की आप अपना दाल चावल, उस दुकान से खरीदना। आप कहें कि नहीं 5 दिन के लिए दूसरी दुकान से खरीद लो, प्लीज। मैं हूँ चलो, मोहलत दी तुम्हे। आज उस भारत की यह स्थिति है। आज अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत की जो दुर्गत इस सरकार ने करवाई है, उसके बारे में तो शब्द कम पड़ जाएंगे। और ये सरकार जो डुगडुगी पीटा करती थी कि पता नहीं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हमने कैसा चढ़ा दिया है सरकार को। मुझे तो शर्म आती है। आज भी संसद में अपने भाषण में प्रधानमंत्री ने इस बात का जिक्र किया कि देश दुनिया में भारत का वर्चस्व डंका बज रहा है, कैसा डंका बज रहा है? भाई कि दुनिया का सबसे बड़ा जो इस वक्त युद्ध चल रहा है, उस युद्ध के बारे में युद्ध विराम की वार्ता होती है। कोई आपको पूछता भी नहीं है। यह कैसा डंका बज रहा है जिसमें आपको गिड़गिड़ा के हाथ जोड़कर मोहल्लत मांगनी पड़ती है कि मैं अपने घर के लिए तेल फला आदमी से खरीद लूं। यह कैसा डंका बज रहा है जिसमें जो आदमी आपको हर तीसरे दिन बेइज्जत करता है। कहता है मैंने भारत का समझौता? मैंने युद्ध रुकवाया, आपकी हिम्मत नहीं खड़े हो के बोल सको कि तुमने नहीं रुकवाया था, अगर है तो बोलो न देखिये, आज से 50 साल पहले ये भी बोल गरीब हैं। तुम्हारी हिम्मत कैसे है कि तुम मेरी पॉलिटिकल फ्यूचर को बर्बाद कर सकते हो। एग्जेक्टली ट्रंप कहता है इंटरव्यू में अच्छा याद दिलाया ट्रंप कहता है कि वैसे मैं चाहूँ तो मैं कुछ ऐसी बात कह सकता हूँ जिससे मोदी जी का पॉलिटिकल करियर खत्म हो जाएगा। लेकिन मैं नहीं कहूँगा। अब क्या मामला है भाई, इतना क्या बड़ा राज, आपके पास हैं। अगर प्रधानमंत्री में हिम्मत है तो ठोक के क्यों नहीं कहते कि हाँ बोलो जो बोलना है, बोल तो देखी जाएगी। देखिये जैसा मैंने बताया, मैं एमरजेंसी का बच्चा हूँ और जो इमरजेंसी के बच्चे थे वो इंदिरा गाँधी के प्रशंसक नहीं हो सकते थे। मैं नहीं था, कभी नहीं था मैं इंदिरा गाँधी का प्रशंस। लेकिन आज मैं पलट के देखता हूँ। 1971 में वो इंदिरा गांधी निक्सन से मिलती है। निक्सन उस जमाने का ट्रंप है जी, जिस तरह की बत्तमीजी ट्रंप करता है, उस जमाने की, उस तरह की तो दुनिया में कोई नहीं कर सकता था। लेकिन उस जमाने का सबसे बड़ा बत्तमीज निक्सन को माना जाता था। वो करता इंदिरा गांधी उसके सामने गयी। आज आप उसके टीवी इंटरव्यू देख कैसे सर उठा के बात करती है निक्सन से और और साफ कहती है कि भारत गरीब था, उनके पास सातवां बेड़ा था जो हिंदुस्तान की नौसेना को बर्बाद कर सकता था। उसके बावजूद वो औरत खड़ा हो सर उठा के। कहती है जो करना है कर लो, मैं करूंगी उस इंदिरा गांधी जिसका में आलोचक रहा जीवन भर उसमें इस देश। ये होती है देश की इज्जत को बढ़ाने वाला काम, ये नहीं जब जबर्दस्ती आप किसी गोरे आदमी के जी लगाने की कोशिश करते हैं और आप हाउडी हाउ हाउ डू यु मोदी करते हैं, जब आप अमेरिका में जाके ट्रंप के लिए प्रचार करते हैं और कितना गिर सकते हैं आप और अंततः उपलब्धि हमारी ये है। अमेरिका पूछता नहीं रूस जो कि पुराना दोस्त था, आज नजरें फेर लिए हैं। और रूस हमसे कहता है कि अच्छा बेटा, अब आ गया न मेरे से लेने के लिए तेल, अब ऐसा करो प्रीमियम रेट, पे दूंगा, वो रूस, वो प्रीमियम रेट पर देता है। चीन हमारे अरुणाचल प्रदेश पर निगाह गाड़ के बैठा है, मौके की तलाश में है। और वो तीसरी दुनिया जिस तीसरी दुनिया का सरताज हिंदुस्तान हुआ करता था, क्योंकि हिंदुस्तान फिलिस्तीन के सवाल पर बोलता था, दक्षिण अफ्रीका के सवाल पर बोलता था। वो उस बिरादरी में आज भारत की हिम्मत नहीं है कि ब्रिक्स की मीटिंग बुला ले और सारे पड़ोसी भारत, भारत सरकार के, भारत की विदेश नीति के आलोचक श्रीलंका के प्रधानमंत्री की हिम्मत होती है कि वो ट्रंप को औकात बता देता है। श्रीलंका का प्रधानमंत्री कह सकता है कि जिस बेड़े को, जिस जिस जहाज को, मीरा के जहाज को शरण देने की, भारत की हिम्मत नहीं हुई, जबकि भारत का शरण में आया था, भारत की, उस पे आया था जी, उसको श्रीलंका शरण दे स कता है। स्पेन के प्रधानमंत्री की हिम्मत हो सकती है, मेक्सिको का प्रधानमंत्री बोल देता है, भारत का प्रधानमंत्री नहीं बोल सकता। मुझे तो शर्म आती है सब कुछ ये देख के किस गर्थ पर हम इस देश को ले आए हैं। पैसा हमारे पास पहले भले ही नहीं था, सामरिक शक्ति हमारी इतनी नहीं थी, लेकिन नैतिक शक्ति थी। उस सारी नैतिक शक्ति को धूल में मिला दिया है इन लोगों ने। हिंदुस्तान डंका छोड़िये ये तो मतलब देश का बैंड बजा रहे है। डंका बजाना 1 चीज होती है, बैंड बजवाना दूसरी चीज होती है। ये भारत का बैंड बजवा दिया। अगर हम अमेरिका तक की बात न करें, हम सिर्फ एशिया महाद्वीप की बात करें तो भारत फिर का स्टैंड करता है। आप ऐसा कीजिए चारों तरफ निगाह डाल कर देख लीजिये। कौन सा 1 देश है जिसकी सरकार के साथ हमारी मोदी जी के जमाने में हमारी हमारी स्थिति मजबूत हुई। चलिए दोस्ती मजबूत न हुई हो, हमारी स्थिति मजबूत हुई है। चीन ही नहीं हुई, सिर्फ नहीं, ऐसे भी काम नहीं चलेगा, क्योंकि वो भारत के 900 स्क्वायर किलोमीटर पर कब्जा करके बैठा है। मोदी जी के जमाने में दही जम गया। मोदी जी के मुंह में बोल नहीं सके। और क्या कहते हैं, न कोई आया, न कोई घुसा। और उसका उस क्लिप का इस्तेमाल चीन ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर किया। जाकर दिखाया कि देखो हिंदुस्तान का प्रधानमंत्री कह रहा है कि कोई घुसा नहीं। इस तरह की बात मेरे प्रधानमंत्री ने की। बंग्लादेश, जो आपका सबसे बड़ा मित्र था, ऋणी था, जो भारत के प्रति, वो, आज उसकी क्या स्थिति है। मतलब अब आप ये कह सकते हैं, दुश्मनी से अब हम 1 स्तर नीचे आ गए। पहले जो 1 साल पहले की दुश्मनी थी, शायद अब दुश्मनी नहीं। या दुश्मनी में कुछ थोड़ा सा कमी आई है। श्रीलंका श्रीलंका का संबंध आज चीन से कहीं बेहतर है। बजाय की भारत से मालदीव सरकार ही भारत का विरोध करके आई, नेपाल सरकार भारत का विरोध करके आई। जो प्रधान मंत्री ओली थे, भारत के वो भारत के विरोधी माने जाते थे, उनसे पहले भारत के समर्थक प्रधान मंत्री तो कुल मिला के चारों तरफ। और पाकिस्तान आज की तारीख में, जब पूरी दुनिया में लड़ाई चल रही है, वार्ता कहाँ होती है, पाकिस्तान पाकिस्तान में होती है, सफल हो, असफल हो, असफल होने के बाद भी ट्रंप उनको धन्यवाद करते। तो किसकी हैसियत बढ़ी किस का दुनिया में डंका बजा। इतने सामान्य तथ्य से आप कैसे? और इसका असली कारण यह है कि जब आप पहला तो जब आप बिल्कुल छोटे छोटे खेल में पड़ते हैं, कहते हैं बिक गया, जो वो खरीदार नहीं हो सकता है। गीत का लाइन है। ये वो मामला जब आप सब तरफ से कॉम्प्रोमाइज्ड हो, जब उसको पता है कि अडानी को टाइट कर दिया, तो ये प्रधानमंत्री अपने आप दौड़ा दौड़ा आएगा। मेरे पास अडानी का केस है, अमेरिका में केस लगा हुआ है। और ट्रंप चाहे तो अडानी के विरुद्ध 1 क्रिमिनल केस कर सकता है। वो सिर्फ बिजनेस का केस नहीं है, प्रॉपर्टी का केस नहीं है, क्रिमिनल केस है, तो ट्रंप के पास चाबी है। जब आपको पता है की एपस्टीन फाइल में कुछ पेपर्स हैं, कुछ न कुछ तो उसमें हैं। जब भी चाहे रिलीज कर सकते हैं, तो आपको पता है कि जैसे कहते हैं न गिच्ची हाथ में है, जब आपको, ये तो आप जब इस तरह के छोटे कम्प्रोमाइज होते हैं, दूसरा, जब आप हर तरफ छोटे छोटे फायदे के लिए, अच्छा, इसमें $4 का फायदा हो सकता, इसमें वो हो सकता है। जब आप अपने सिद्धांतों को बिकाऊ बना देते हैं, तब दुनिया में यही होता है कि काम भी नहीं बनता और इज्जत भी चली जाती है। ये दोनों हुआ है। न काम बना, न इज्जत, बची। इस वक्त भारत की विदेश नीति की, जो अवस्था है, देख के भारतीय के रूप में मेरा सर शर्म से झुक जाता है। कास सेंसेस की बात हम आपसे 1 बार करेंगे। 14 अप्रैल को आपने 1 ट्विट में बहुत अहम बात की। जो मेंस चर्चा में लगभग गायब ही रहा। आपने लिखा कि जिस सेंसेस के आधार पर डीलिमिटेशन होगी, उसका फैसला संविधान से हटाकर सामान्य कानून के दायरे में डाल दिया जाएगा। आज की बातचीत की चर्चा में इस पे आपने जिक्र किया। अब आप मुझे बताइए कि जो आपने इतना बड़ा ट्वीट किया वो क्यों इस पूरी चर्चा के विषय से गायब है। इस देश में बहुत बड़ी बड़ी चीजें गायब रहती है। और चूँकि जो चर्चा इस देश की होती है, वो कुछ खास वर्गों की, कुछ खास हितों की और कुछ खास मजबूरियों के चलते वो चर्चा होती है। इस देश का जो मीडिया है, इसे नेशनल मीडिया, जिसको बोला जाता है, मैं उसे नोशनल मीडिया बोलता हूँ। ये नोशनल है, नाम के वास्ते मीडिया है, इसके जो बड़े बड़े लोग हैं, दुर्भाग्य से मैं इन सब को जानता रहा हूँ। और दिक्कत यह रही कि मैं जब ये आज तक शुरू हुआ था, न, अशविंद, प्रताप, सि, सिंह, क्यूँ इतने मेहरबान हुआ करते थे, तो मेरे को दफ्तर में बैठा के रखते थे। मेरे साथ। तो ये जो बड़े बड़े, हिंदी पत्रकारिता के नाम है, इन सबको मैंने बच्चे के रूप में देखा हुआ है। और इसलिए नाम लेके कहते हुए संकोच होता है। अभी भी पुरानी बातों का लिहाज मन में रहता है। लेकिन जिस दुर्गत पे लोग ले आये हैं, तो ये जो तथाकतित चर्चा होती है, जिसे नेशनल मीडिया और टीवी की चर्चा कहा जाता है, उसकी क्या हालत होगी? वैसे न। आज मैंने 1 बार छोटा सा इंटरव्यू देखा, वो ओरबान को हंगरी में जिस व्यक्ति ने हरा दिया है, वो टेलिविजन इंटरव्यू पर जाता है और टेलिविजन पर 1 एंकर हैं। जिस टीवी ने डेढ़ साल से उसका चेहरा दिखाना बंद कर दिया था, क्योंकि ओरबान ने इशारा किया था, अब वहाँ वो इंटरव्यू देने गया है और अब उस महिला की हालत देखने लायक है जो उसका इंटरव्यू कर रही है। और वो कहता है। मुझे बहुत खुशी है कि डेढ़ साल बाद हम मिल रहे हैं, हम तो आपको हमेशा बुलाना ही चाह रहे थे। ये सब बातें होती हैं। 1 दिन, ये दिन भारत में भी आएगा। अब मैं इनका महिलाओं का और पुरुषों का नाम नहीं लेना चाहता। जरा सोचिए जब इनका होगा, जब ये कहेंगे नहीं नहीं, हम तो आपको हमेशा ही चाहते थे। देखिये न मजबूरी है, ये, कई लोग, करते हैं। नई नई योगेंदर जी, हम तो चाहते हैं आपसे बात करना। देखिए न कुछ मजबूरियां हमारी भी है। तो ऐसा इस देश में भी होगा, इस देश में भी। चर्चा। जिस दिन खुलेगी तो बड़े लोग कहेंगे, देखिए, मैं बहुत घुटन में हुआ करता था, उन दिनों मैं नहीं कर पा। अच्छी अच्छी कहानियां आपको सुनने को मिलेगी। तो जो मैंने क्लिप आज देखी, वो इस देश में भी चलेगी। अच्छा आपको कई सारे मीडिया डिबेट्स में जाते रहते हैं। बड़े बड़े चैनलों के माध्यम से आपके अनुभव क्या होते है उन मंचों पर जाने का, किसी विषय पर बातचीत करने का जो व्यक्ति आपके सामने बैठा है, वो किस तरीके से आपके पूरे? कन्वर्सेशन को 1 नेरेटिव की बाल्टी में ले कर डाल देना चाहता है, उस कंडीशन में आप क्या महसूस करते हैं? आमतौर पर मैं नहीं चाहता। आप कहते हैं में टीवी की बड़ी डिबेट्स में रहता हूँ। सच यह है कि हिंदी का कोई चैनल हर चैनल को बेसिकली। इंस्ट्रक्शन ये मिला हुआ है कि अंग्रेजी में थोड़ा सा बकबक करने। 2 हिंदी में नहीं, जो मेरी समझ में, जो मेरी सामान्य भाषा है, जिस भाषा में बोलना, मैं पसंद करता हूँ, मेरे खयाल से जो मैं बेहतर बोलता हूँ, अंग्रेजी की तुलना में, तो निश्चित बेहतर बोलता हूँ हिंदी, उसमे न आने। 2 यही बात हिंदी में भी, अखबारों में भी है। अंग्रेजी में कल मेरा छप जाएगा। वो अखबार जो 10 साल पहले मुझसे आग्रह किया करते थे की आप कभी भी कुछ भी तो लिख दीजिये। वो कहते हैं न आपका छाप नह कॉन्ट्रेक्ट करके वापिस ले लेते हैं। वो अखबार कभी लिखूंगा। मैं इस सबके बारे में कहानियां सच्चाई ही। तो ये तो बुलाते नहीं। कंटलेबगरमेंएकदो बार में फंस गया। वो भी कुछ दोस्तों के आग्रह और सब की वजह से बिल्कुल ठीक कह रहे हैं। का किसी भी खबर विश्लेषण से कोई सम्बन्ध नहीं। यह शुद्ध आपने तो व्यवसायिक कहा, व्यावसायिक भी नहीं। यह तो 1 राजनीति का लेने देने का भी चक्कर होता है। तो लेन देन का चक्कर है। मीडिया के मालिक जो है ये इस वक्त मीडिया के मालिक नहीं हैं। ये साथ में हर कोई अपना धंधा चलाता है। 1 दूसरा और मीडिया का इस्तेमाल अपने दूसरे धंधे को आगे चलाने के लिए किया जाता है, तो उस धंधे को आगे कैसे बढ़ाया जा? सके किसी की माइंस हैं, किसी की दूसरी कंपनी है तो अपने व्यावसायिक हितों को बचाना। टीवी और मीडिया के सहारे ये खेल होता है। इन सब कॉंकलेप्समेंऔर वैसे भी मुझे लगता है कि विचारों का गंभीर आदान प्रदान ऐसे किसी मंच पर होता नहीं। जैसे मैंने कहा, मैं भी गलती से 21 बार फंस गया, लेकिन वहां से बहुत ही क्या कहें मतलब 1 मन खट्टा करके वापस आया। कान पकड़ के आया कि न ऐसे चक्कर में आगे से नहीं पचा। एस आई आर का जिक्र करते हैं। हम बिहार में जो चुनाव खत्म हुआ, करीब 65 लाख नाम डिलीट कर दिए गए थे, अब वेस्ट बंगाल की बारी आ गई है। वेस्ट बंगाल में भी 90 दशमलव तिरासी लाख नाम काट दिए गए हैं। यानी करीब 11 दशमलव 67 प्रतिशत वोटर लिस्ट से हटा दिए गए हैं। ये आबादी आई थिंक सुज्जरलैंड की आबादी से भी ज्यादा है। मैं आपसे यह समझना चाह रहा हूँ कि विपक्ष प, पूरा विपक्ष और आप या प्रशांत भूषण जी जो पी आई एल दाखिल करते रहते। पिछले दिनों ममता बनर्जी भी सुप्रीम कोर्ट में पहुंची थी और आपने भी कुछ 2 लोगों को ढूंढा था, वो 2 लोग कैसे मिले। पहले तो मुझे उनके बारे में बताइए और फिर मुझे बताइए की हम क्या कर रहे हैं। इस एस आई आर की प्रक्रिया से बचने के लिए और जो जनता जिस भी पैमाने पर चुन रही है, अपने नेताओं को, अपनी सरकार को, जिसे चुन रही है वही चुना जाए। इस चीज को, इस चीज की सुनिश्चित करने के लिए। पहला वो जो कहानी है वो तो बड़ी साधारण सी है, एस आई आर पे चर्चा शुरू हुई थी और बिहार में काफी नाम काट रहे थे, हमने कहा हर रोज अखबार में आ रहा था, इतने लोगों के नाम कटे डेली ब्लिटेन आ रही थी। हमने सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई में कहा कि देखिये लोग जीवित हैं इनके नाम काट रहे हैं। तो उस वक्त जस्टिस सूर्यकांत ने कहा जिस ने कई बीच बीच में बहुत सुंदर बातें कही हैं। तो उन्होंने कहा की अरे हम हैं न, अगर 5 10 लोग ऐसे हैं जो कि मृत है तो लाइए नाव में लाने का मतलब शायद उनका यह नहीं रहा होगा कि सुप्रीम कोर्ट में लेके आए, मेरे सामने लेकर आए। लेकिन चूंकि उन्होंने कहा था तो हमारी जिम्मेदारी बनती थी। तो मैंने साथियों को फ़ोन किया कि यार तुम बता रहे हो, पर मैंने कहा देखो चेक करके लाना, अब दिक्कत ये थी मिल तो सैकड़ों जाते लेकिन सरकार ये लिस्ट जारी नहीं कर रही थी कि कौन दंड है लेकिन 23 तहसीलदारों ने गलती से वो लिस्ट जारी करके पार्टी को पकड़ा दी थी। हमें ऐसी 2 जगह मिल गयी जहाँ हमारे पास साइंड लिस्ट थी, लोग बहुत थे तो हर तरफ थे लेकिन 2 जगह हमें साइंड लिस्ट मिल गयी जहाँ मृत घोषित किया हुआ थ। मैंने कहा कि इनमें से कुछ लोग हैं, उनका बाकायदा है, मिली थी कल परसो औरत मिली थी। तो फिर मैंने कुछ 12 दोस्तों से आग्रह किया की अब किसी तरह से सोमवार को शायद हेरिंग थी और शुक्रवार को बात हुई। मैंने कहा किसी तरह से लाए और 1 टीम बैठा दी कि भैया ठोक पीट के जाँच कर लो, की केस सुप्रीम कोर्ट में ले जाना है, कुछ गड़बड़ न हो, अच्छा हकीकत यह की मुझे पेश नहीं करना था, वो 1 दुसरे वकील हैं, हमारे उन्हें पेश करना था, उनका नंबर नहीं आया। उस दिन जो मेरे वकील हैं सादान फराश उनका नंबर नहीं आया और समय हो गया था। तो जब मैं बोलने के लिए खड़ा हुआ तो साधन ने मेरा कुर्ता खींचा और कहा की योगेन जी अब आप लास्ट स्पीकर हैं, आप इसका जिक्र कर दीजिए, नहीं तो अब अगली हेरिंग कब होगी और इनको हम दुबारा कैसे बुलाएंगे। तो मैंने उनका जिक्र कर दिया। अच्छा मजे की बात ये की वो जिक्र करने के बाद रात 10 बजे इलेक्शन कमीशन की तरफ से फ़ोन आया, मैं तो पहचानता नहीं था इलेक्शन कमीशन की तरफ से, आप क्या हमें उनकी डिटेल दे सकते हैं। मैं उस वक्त रेवाडी में था, बीमार भी था उन दिनों में काफी ज्यादा, दरअसल उस वक्त बोल रहा। तो उस वक्त मेरी को सीरिंज लगी हुई थी, इंटरवेनेसइंजेकशं मेरे चल रहे थे क्योंकि तबियत खराब थी तो मैं तो रेवाड़ी में था, लेकिन मैंने तुरंत अपने साथी से कहा की भाई इनको तुरंत उनका डिटेल्स भेज दिया जाए। तो हमारे पास हमने उसका नाम, पिता का नाम, कों्स्टीट्ेंसी का नाम और उनका ये सारी डीटेल्स थी, जितनी डीटेल हमारे पास थी वो हमने भेज दिए। अब इलेक्शन कमीशन देखिये इलेक्शन कमीशन ने पंद्रह दिन बाद आकर कोर्ट में कहा कि योगेंद्र यादव पता नहीं किन लोगों को लेके आए थे ये तो फेक नाम हो सक आप से जानकारी लेने के बाद मेरे से जानकारी लेने के बाद। तो फिर उन्होंने बोला मैंने छोड़ा छोड़ो इनको बोलने 2 अगली बार चुनाव आयोग ने लिख के ये आरोप लगाया, जब लिख के लगाया तो मेरे पास कोई ऑप्शन नहीं था, फिर मैंने हल्फनामा दिया, हलफदामेमेंमैंने कहा की देखो कितने झूठ बोलते हैं, मैंने वो उसका लगा दिया, स्क्रीनशॉट वाट्सप क की इन्होंने 10 बज के निशान सामने खड़े हैं, इन्होंने किया था ये। मैंने कहा 10 बजकर 2 मिनट पर इनका प्रश्न आया था और 10 बज कर 55 मिनट पर हमने जवाब दे दिया है। और यही नहीं उसी दिन इंटरव्यू किया गया था। 1 चैनल द्वारा, उस व्यक्ति जिसमे वो व्यक्ति पूरा बता रहा है, मैं फला गाँव से हूँ, ये हूँ वो हूँ वो सब बता रहा। यही नहीं मैंने कहा कि हमने चुनाव आयोग ने उसके बाद जितने सप्लीमेंटरी एफिडेविट दिए हैं उनमें हम इन तीनों लोगों की पूरी डीटेल्स 1 नहीं 3 बार दे चुके हैं। चुनाव आयोग ने कहा इन्होंने हमारे को उनका आईडी कार्ड का नंबर नहीं दिया। तो फिर मैंने चेक करवाया। और मैंने कहा की अगर किसी व्यक्ति की इतनी सूचना आपको पता है उसका नाम, उसके पिता का नाम, उसका जेंडर, उसकी आयु, उसका जिला, उसके बाद आपको 2 दशमलव 7 सेकेंड लगते हैं डेटा बेस पर चेक करने की। और जब मैं बाहर से चेक कर रहा हूँ इलेक्शन को और आपको 2 हफ्ते में पता नहीं लग सका लोगो के पूरा किस्सा है और आज तक चुनाव आयोग इस झूठ को बार बार दोहराता रहता है पता नहीं किन लोगो को लेके आ गए थे हमें तो पता नहीं तो खैर यह तो वो है जो एस आई आर का असली बाबा है हम क्या कर रहे हैं हम अपने तईं जो कर सकते थे सच कहूँ तो एस आई आर पी कर कर के हम तो ये तो नहीं मैं कहूँगा थक गए हैं लेकिन 1 सीमा आ गई है और क्या कर सकते हैं कोर्ट कचहरी में जितना बोल सकते थे बोल दिया वही जज साहबान जो की पहले दिन 10 जुलाई को जब केस आया उस वक्त बेंच में यही जस्टिस बातचीत थे उन्होंने छूटते ही इलेक्शन कमीशन को बोला था। अरे भाई तुम जल्दी में क्यूं कर रहे हो आराम से करो न 6 महीना कम से कम लो और चुनाव से पहले करने की क्या जल्दी है बाद में कर लेना। लेकिन आज कुछ और बात चल रही है, वहीं जज जो कह रहे थे कि अगर 5 10 लोग भी अगर मृत है जो लिस्ट में हमारे पास आइए न हम ले आए लेकिन कुछ नहीं हुआ जो हो गया है मामला कि वहाँ ये तय हो चुका है कि जो लोग नहीं हैं उनके नाम दिखाए जा चुके हैं, सब कुछ किया जा चुका है। लेकिन चुनाव सुप्रीम कोर्ट जिस फैसले का अभी, जिस मुकदमे का फैसला नहीं हुआ है, एस आई आर संवैधानिक है या नहीं है इसका फैसला आज तक नहीं आया है। लेकिन वहीं सुप्रीम कोर्ट कह रहा है कि एस आई आर को छेड़ेगा भी नहीं रोकना। इसे कोई नहीं रोक सकता। तो आपने तो जजमेंट दे दिया जजमेंट देने से पहले तो यह तो सुप्रीम कोर्ट का मामला है और जमीन पर जितनी हमारी क्षमता थी, हम कर रहे हैं। मेरी उम्मीद है की पोलिटिकल पार्टीज भी कुछ बेहतर करेंगे। हालांकि ममता बनर्जी ने कोई कसर नहीं छोड़ी है। अपनी तरफ से अगर उतना ही क कोशिश बाकी। सब पार्टियां सब राज्यों में हालात कुछ दूसरे होते है, मन नहीं कर रहा। काफी अछी बात हुई, बहुत बढ़िया लगा तो शुक्रिया सिर हमें समय देने के लिए, बातचीत करने के लिए और आपको ये बातचीत कैसी लगी आप इस पर 1 टिप्पणी करे तो हमें अच्छा लगेगा। क्या हमने जरूरत के सारे मुद्दे कवर करने की कोशिश करी थी, वो कर लिया या नहीं किया। सारे मुद्दे न कभी कवर होते हैं न होने चाहिए क्योंकि अगर हो जाएंगे तो अगली बातचीत की गुंजाइश कैसे बचेगी तो चलते रहना चाहिए। कई हमारे इलाकों में प्रथा है। प्रथा यह है कि अगर आप किसी से उधार लेते है तो आप पूरा एग्जेक्ट उतना वापस नहीं करते। 10 रूपए अगर उधार लिए हैं तो या तो 9 वापिस करेंगे या 11 वापिस करेंगे ताकि संबंध चलता रहे, ताकि बातचीत चलती रहे। तो मैं समझता हूँ बातचीत तो चलती रहनी चाहिए, कुछ लेन देन, कमी बेशी तो होनी ही चाहिए। बहुत अच्छी चर्चा हुई, खुल के हुई और ये जो टी वी पे चर्चा के नाम पर जो चीजें होती हैं वैसी नहीं हुई और आपने किताब पढ़ के चर्चा की इसके लिए मैं बहुत आभार सर शुक्रिया और साथ में मैं आपसे 1 और आग्रह करूँगा की आप अगले समय हमें कब दे रहे है की हमें बहुत ज्यादा भागना न पड़े और हम बहुत सारे जो सवाल है उसको और आगे पूछ पाए उधर बाद में पूरी करेंगे ठीक है सर शुक्रिया शुक्रिया सर धन्यवाद सोल्ड देख रहे थे आप मेरा नाम अनिल शारदा है हमारे साथ योगेंद्र यादा जीते शुक्रिया।