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Why Nehru Scares Bjp Jan Hith Mein Jaari 016

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TITLE: Why Nehru Scares BJP | Jan Hith Mein Jaari | 016 CHANNEL: Kunal Kamra DATE: 2025-12-20 ---TRANSCRIPT--- the stock of midnight are when the world slept, india walked to life and freedom hundred away in delay, independence day, was also a day of or joicingtomuchiwas, croud fill, the streets celebrating, the singing and long। पर आरएसएस और मोदी जी सोते ही रहे। जब तक कन्ना ने 2014 में फ्रीडम अनाउंस नहीं की, आजादी अगर भीkmेmileto आज़ादी हो सकती है। आप खुद बताइए, वो आज़ादी नहीं थी, वो भी थी। और जो आज़ादी मिली है वो 2014 में मिली है। और नेहरू का भूत आज तक हमारे वाट्सएप अंकल्स को सता रहा है। ये बहुत हर जगह है जब भी कोई बम करने को नहीं मिलता, नेहरू का नाम सबसे आगे आ जाता है। नेहरू को बिठा दिया गया। अगर देश के पहले प्रधानमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल होते तो मेरे कश्मीर का यह हिस्सा आज पाकिस्तान की इस मामले को इन्टरनेशनलाइज करने वाले कांग्रेस के ग्लोबल यु एन को लेके चले गए। कौन ले के गया हमारे देश के प्रधान मंत्री जी जो फर्स्ट प्रधानमंत्री जी हैं, पंडित जलाल नेहरु जी इसको युएन में लेके चले गए। क्यूँ ये भी 1 बहुत बड़ी भूल थी की जवाल लाल नेहरु जी ने जो हमारा अंदरूनी मामला था उसको यूनाइटेड नेशंस में रखा और पाकिस्तान का लोकस क्रिएट किया। 1 अलग सा लव हेट रिलेशनशिप है मोदी जी और नेहरू का। पहले खुद को नेहरू से कंपेयर करते हैं फिर उनके नाम ऐसी ख्याली पुलाव पकाते हैं और खुद को बिरयानी बता कर जीत की इलाइची चक लेते है। और अब जब नेहरु जी की सारी गलतियाँ अब भरेंली मोदी जी सुधर रहे हैं तो इस ओनली फेर की एक्सचेंज में नेहरु जी भी मोदी जी की गलतियों की रेस्पॉंसिबिलिटी ले ले। गली क्रिकेट का बब्लू जब 2 बार किसी का कान तोड़ देता है तो खुद को सचिन तेंडुलकर कहने लग जाता है पर उसे कोई सीरियसली नहीं लेता पर। लेकिन अगर बैठ बब्लू का बॉल, बब्लू का अम्पायर भी, बबलू का फील्डिंग सेट करने वाला उसका दोस्त गली का गुंडा मोटा भाई डब्लू, तब तो सबको मानना पड़ेगा की बबलू ही सचिन है। कुछ ऐसी स्थिति है नेहरु और नरेंद्र की भी। मीडिया नरेंद्र की पुलिस, नरेंद्र की जुडिशरी, नरेंद्र की फ़ोन का डेटा। तक नरेंद्र का तो 60 साल बाद भी भक्त लगे हुए है। बबलू को सचिन बनाने में और सचिन को बब्लू बनाने में। आरोप बनता बस उनका मजाक है। लगता है नेहरु ने सिर्फ आजाद भारत का फाउंडेशन नहीं दिया लेकिन मीन मेकर्स को बहुत कॉन्टेंट भी दे दिया। कहा मिलेगा आज के जनहित मे जारी के एपिसोड में। हम बात करेंगे नेहरु पर लगे इल्जाम की। देखिये आपकी इच्छा रहती है न मैं पंडित जी का नाम नहीं बोलता हूँ। आज मैं बार बार बोलने वाला हूँ। आज तो नेहरु जी ही नेहरू जी लिस्ट लम्बी है। बल्कि 1 पूरी किताब है नाइनटी सेवन ब्लंडर्स ऑफ नेहरु अरे रुकिए। मोदी जी ने फिर 1 बार स्पीच दे दी। अब वो ब्लंडर्स हंड्रेड हो गए। नेहरू का बूत इंडियन पॉलिटिक्स में पहले भी देखा गया, पर बस क्यूँ की बबलू अपना बड़बोला है। और मोटा ने बोला है तो मीडिया के माध्यम से भूत की कहानिया चरम पर है। नेहरू पर इल्जाम नंबर 1 पार्टिशन राइटिंग का मानना है। नेहरु ने अपनी कुर्सी के चक्कर में देश तोड़ दिया। तो मतलब अब जितना भी खबर में सोच रहा होगा की और कुछ दिया या नहीं। कम से कम ये क्रेडिट तो जितना ऐसी मत छीनो। 200 साल की डिवाइड रूल की पॉलिसी वाले अंग्रेज भी जब आर एस एस और हिन्दू महा सभा को देखते हैं, जो फ्रीडम फाइटर्स को ही पार्टिशन का दोषी बताए, वो तो खुशी खुशी हमसे 6 छक्के और खा लेंगे या ब ऐसी अपनी बहन बना देंगे। एग्जाम नंबर 2 है कश्मीर बबलू का चेला चिंटू जिसका दंडा नोटबंदी में फंस गया और फिर लॉक डाउन में बंद ही हो गया। जिससे 2 महीने से मकान मालिक को भाड़ा नहीं दिया। अब पकोड़े की दुकान लगा कर दाल रोटी चला रहा है। उसको भी लगता होगा कि अब तो मोदी जी ने नेहरू की गलती सुधार दी है। 370 हट गया, अब वो भी कश्मीर में दल लेख के बाजों में जमीन खरीद सकता है और 1 बार बस अगली वीर बन जाए तो लाइफ ही सेट है। इन लोगों के लिए। कश्मीर बस 1 जमीन का टुकड़ा है, लोगों की बस्ती नहीं। खैर कश्मीर को लेकर भक्त अंक का सबसे बड़ा इल्जाम नेहरू ने कश्मीर के मुद्दे को पनपने दिया, यूनाइटेड नेशंस चले गए, इन्टरनेशनल डिस्प्यूट बना दिया। ए वी पी के लंगूर 1 नारा लगता है। जहाँ हुए बलिदान मुखर्जी वो कश्मीर हमारा है। अब आप सोचेंगे ये बलिदान मुखर्जी कौन है। राइट विंग इको सिस्टम के बड़े लीडर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ताजुब की बात है की जिस कैबिनेट में कश्मीर के मुद्दे को न ले जाने की मंजूरी दी उसमें हमारे बलिदान मुखर्जी मौजूद थे, और इसका समर्थन भी गया। दूसरी बात जो लोग कहते है की सरदार पटेल अगर होते तो ऐसा कभी नहीं होता। सच तो ये है कि वो हैदराबाद और जूनागढ़ में ज्यादा इंटरस्टेड थे। सच तो यह है की आर्टिकल थ्री सेवेंटी की ड्राफ्टिंग ही खुद सरदार पटेल ने की थी, नेहरू तो वहाँ थे भी नहीं। और ये सारे डीटेल्स वाट्सएप यूनिवर्सिटी के सिलेबस से बाहर है। तरस आता है पर जब आजादी की लड़ाई चल रही थी तब इन्होंने कह दिया आजादी हमारी प्रायोरिटी नहीं है, क्यूँकी प्रायोरिटी तो पेंशन थी 31 अक्टूबर को मेरे मामा कह रहे थे बीजेपी सरदार पटेल का बद बना रही है। इंदिरा गाँधी की भी डेटा नंबर स्री है आज। और वो तो कांग्रेस के नेता थे उनका वही देखे। तब मैंने पूछ लिया की सरदार पटेल कौन सी पार्टी के नेता थे। मामा जी अभी तक सदमे में है, कमेंट में जरा अपने मामा का ध्यान रखते हुए गेट लिख दीजियेगा। डॉक्टर ने कहा है की किसी भी हालत में ये मत बता देना की भगत सिंह इथिसटऔरकॉमयनिस थे, ऐसा सदमा वो बिल्कुल बर्दाश्त नहीं कर पाएंगे। जाहिर है इनके पास अपने खुद का तो कोई नेता है नहीं, इसलिए कांग्रेस के स्टॉल वर्ड लीडर्स को अपना हीरो बता कर काम चलाना पड़ता है। पर आज वाले करप्ट कांग्रेस ही तो सत्य परेशान हो सकता है, पर पराजित नहीं। यह कोड वर्ड एक्स पर ट्वीट कर के तुरंत अपना सत्य लेकर बीजेपी के वाशिंग मशीन में पहुँच जाते हैं और शास्त्री या पटेल से इनका दूर दूर तक कोई नाता नहीं। नेहरु ने 1 डी पी डिवाइडेड देश को साथ लाया। 500 से ज्यादा प्रिंसली स्टेट्स को भारत में जोड़ा और सरदार पटेल। ने इसमें मुख्य भूमिका निभाई। और नेहरु और पटेल अलग नहीं थे। आज तो 1 फोटो ब्रिज या उसके नीचे वाटर कूलर का क्रेडिट भी प्रधान मंत्री। मोदी जी को चाहिए 1 मेयर का इलेक्शन भी उनके नाम पर ही लड़ा जाता है। पर नेहरू का रोल राइट ऑफ करना अडवानी जी को घर बढ़ाने आसान नहीं है। नेहरु ने हमेशा देश को जोड़ने का काम किया। आजादी के वक्त अलग अलग भाषाओं पर बहस गर्म। ये शो आज जितना इमोशनल है। तब इससे कहीं ज्यादा था। हर कोई इस नए देश में अपनी 1 पहचान ढूंढ रहा था। नेहरू ने सबका सम्मान करते हुए बिना कोई 1 लैंग्वेज इम्पोज किए लैंग्वेज बेस स्टेट्स बनाये और यूनिटी इन डाइवर्सिटी की मिसाल कायम की। अब आते हैं तीसरे एग्जाम पर। नेहरू नहीं होते तो इकॉनमी आसमान छू रही होती। नेहरू ने लाइसेंस राज बना दिया। इल्जाम ये भी है की नेहरु ने हैरी इंडस्ट्रीज पर ज्यादा फोकस किया और इस वजह से ग्रे कल्चर पिछड़ गया और सरकारी संस्थान बनाते रह गए तो प्राइवेट सेक्टर डूब गया। पर जरा सोचिए उन्हीं सरकारी संस्थानों में आज देश के बच्चे पढ़ते हैं, उन्हीं सरकारी नौकरियों के खाब देखते देखते कोचिंग सेंटर भर देते हैं। और 10 साल से पिछले 70 साल का रोना रोने वाले प्रधानमंत्री ने कभी ये सोचा की 200 साल की ब्रिटिश हुकूमत के बाद क्या था हमारे पास और नेहरु को कहाँ से शुरू करना था। 30 साल की लाइफ, एक्सपेक्ट एटी, फोर, परसेंट की लिटरेसी, महिलाओं में नाइनटी परसेंट की लेसी, अनपरा, अकाल और 1 डीपी डिवाइडेड देश नाइनटीन फोर्टी सेवन में हम कैपिटल गोड्स बनाते ही नहीं थे। पूरा देश इम्पोर्ट पर चल रहा था। नाइनटी परसेंट से ज्यादा, मशीनरी, इक्विपमेंट सब बाहर से आती थी। नाइनटीन सिक्स्टी तक ये नंबर सिक्स्टी थ्री परसेंट हुआ और नाइनटीन सेवेंटी फोर तक ये नंबर नाइन परसेंट रह गया। आज तो सरकार और मीडिया ने में ऐसा अदा किया है। पिता की सरकारी नौकरी पर सरकारी स्कूल से पढ़ कर सरकारी आई आई टी के लिए कोचिंग इंस्टीट्यूट भर कर, सरकारी एम्स में इलाज करवा कर उन्हें सरकारी सुविधाओं को गाली देते हुए सरकार का गुणगान करते हैं। और ये सारे बेसिक एसेंशियल से लेकर एमबिशिसएडुकेशन और बड़ी नौकरी के परेशन सब नेहरु ने इस देश को दिया। अगर सब कुछ प्राइवेट सेक्टर के हवाले कर देते। इसका सीधा मतलब होता वर्कर्स का एक्सप्लोइटेशन और महंगी सुविधाएं पब्लिक सेक्टर देश के लिए 1 स्टैंडर्ड सेट करता है और उसी के कंपेरिजन में प्राइवेट सेक्टर बेटर परफॉर्म करता है। पर अगर सरकारी सेक्टर का कोई स्टैंडर्ड ही न रहे तो 1 आम आदमी की प्राइवेट सेक्टर के सामने क्या हैसियत। रहेगी। अंग्रेजों की तरह हमारे पास कोई कॉलिनी नहीं थी। ब्रिटेन के इंडस्टरलाइजेशन का आईटी फाइव परसेंट इन्वेस्टमेंट उसके कॉलनीज से आया था। तो सवाल ये था की हम इंडस्ट्रीलाइज करे कैसे? यहाँ श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल जैसे देशों को कॉलोनाइज कर ले। लेकिन हमने नया मॉडल दिया जमींदारी खत्म की जिसने सदियों तक किसानों की कमर तोड़ रखी थी। आज़ादी के बाद के पहले 21 सालों में खेती बाड़ी में इतना काम हुआ जितना उसके पहले 200 सालों में मिलकर भी नहीं हुआ था। फिफ्टी और सिकटी के दौर में ट्रेड यूनियन मूवमेंट अपने पीक पर था। मजदूर अपने अधिकार के लिए खड़े थे, आवाज उठा रहे थे। आज जो विकास पर लेक्चर देते हैं, उनसे 1 सीधा सवाल। पिछले 12 सालो में मोदी जी ने इसे खुद का क्या बनाया है। कौन सा इंस्टीट्यूशन, कौन सी संस्था और कौन सा विकास का नया आधार बनाया। कम बिगाड़ा, ज्यादा बेचारी वही जो किसी और ने बनाया था। अब देखते हैं नेहरु जी ने क्या बनाया? आई आई टी, आई सी एस, आई आर, भाभा, अटॉमिक, रिसर्च, सेंटर, म, डी आर, डी, ओ, भारत, हैवी, इलेक्ट्रिकल्स, हिंदुस्तान, मशीन, टूल्स, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी, आरोप, मोदी जी बस बने बनाये का बंडा धारी नहीं करते। उनकी भी अपनी कुछ डिस्कवरी तो है नाली से गैस, बादल में बेनेफिट, गणेश जी की प्लास्टिक, सर्जरी, एम्स, दरबंगा, ये सब उनकी महान खोज है। भारतीय खोज भी मोदी जी का ही आइडिया था। प्लेजरिजम को तो आप जानते ही है। ताली थाली, गोबर मूत्र से देश आगे नहीं बढ़ सकता है। बढ़ता है उन इंस्टिट्यूशन के बलबूते पर जो नेहरू ने बनाई थी। कल्चर के नाम पर। आजकल जो चल रहा है उसके कंपेरिजन में देखते है नेहरु ने क्या बनाया था। नेशनल स्कूल, ऑफ़ ड्रामा, नेशनल स्कूल ऑफ डिजाइन, संगीत, नाट्य, अकेडमी, फिल्म, टेलिविजन, इंस्टिट्यूट, ऑफ़ इंडिया। एम्स के पुराने डॉक्टर बताते हैं कि नेहरू ने उन्हें इंस्पायर किया। उन्होंने कहा की वो अपना देश बनायेंगे। इसी स्पिरिट के साथ लोग विदेश से भी वापस आये और एम्स जैसा इंस्टिट्यूट खड़ा किया। आजकल तो लोग इसी देश के टैक्स से पढ़ कर विदेश में कमाने जाते हैं और बस कहीं दूर से ही मोदी मोदी करते रहते हैं। देश से प्यार तो है पर इनका रिलेशन लॉंग डिस्टेंस है। आजादी के बाद देश में मलेरिया, टी, बी, लेफ्टी, स्माल, पॉक्स सब फैला हुआ था। तब नेहरू ने नेशनल टीवी, इंस्टीट्यूट, बैंगलोर, टीवी, रिसर्च, सेंटर, चेन्नई, जिपमरपोडचरीसबदरजंग, दिल्ली, पी, जी, आई चन्दीगढ़, निमहंस, बैंगलोर समेत कई सारे इंस्टीट्यूट बनवाए। 36 नए मेडिकल कॉलेजेस, 70 नर्सिंग स्कूल, 300 ट्रेनिंग स्कूल खुले। ताकि इंडिया में डॉक्टर और नर्सिंग की कमी दूर हो। उस गरीबी, भूख और बीमारी हर जगह थी। तभी नेहरू ने 3000 प्राइमरी हेल्थ सेंटर बनाए और फिर आज के हेल्थ केयर का हाल देखिये। हमारे हेल्थ मिनिस्टर खुद 1 बाजारू बाबा के बगल में बैठ कर उसकी नकली दवाई को कोविडक्ौरबताकर लांच कर देता है। पुष्पक, विमान और गौमूत्र में साइंस ढूंढने वालों को पढ़ना चाहिए की होमी बाबा ने नेहरु के बारे में क्या कहा था? अलबत्ता नेहरु कुछ साइंटिस्ट नहीं थे। पर उनकी पर्सनैलिटी में 1 वैज्ञानिक व्यक्ति के सारे गुण मौजूद थे। लगातार सीखते और सिखाते रहने की भूख मेडिमरिलमैनऑफ़सायंस। ये होमी बाबा के शब्द थे। आज तो विश्व गुरु पहले ही सब चीजों के एक्सपर्ट हैं। इन्हें कोई क्या सिखाएगा चंड? बाजी के चक्कर में इकॉनमी की कमर तोड़ दी जाती है। पर नेहरू के समय में 1 प्लानिंग कमिशन था। नाइनटीन फिफ्टी में बनाया कमिशन नेहरू के साइंटिफिक, टेम्पर और सोशल विजन का प्रैक्टिकल रूप था, जहाँ से देश के लिए फाइबर प्लान्स बनाए गए, ताकि रिसोर्सेस का सही इस्तेमाल हो और हर सेक्टर में विकास हो। खेती, उद्योग, शिक्षा या स्वास्थ से देश को 1 डिरेक्शन स्ट्रक्चर दिया। उस दौर में जब सब कुछ नया बन रहा था, प्लानिंग कमिशन ने इंडिया को रैंडम डिसिशन जैसे नोटबंदी या लॉक डाउन से बचाया और 1 कॉर्डिनेटर नेशनल स्ट्रैटेजी दी। आज नाम करेन्द्र मोदी ने। वही कमिशन को नीति आयोग बना दिया है। नेहरू का विजन सिर्फ पॉलिटिकल और इकॉनोमिक नेशन बिल्डिंग तक सीमित नहीं था। उन्होंने कल्चरल और इंटेलेक्चुअल इन्फ्रास्ट्रक्चर भी बनाया था। उनके दौर में आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया को नए रिसोर्सेज और रिस्पेक्ट मिले ताकि भारत की हिस्टोरिकल और कल्चरल हेरिटेज को संभाला जा सके। पर अब तो ऐसा बस ऐसे ही खुदाई के काम आता है। और कम्यूनल कॉनफ्लिक् बढ ता है। हेरिटेज के नाम पर बस हेट रह गया। हर संस्थान का अब यही हाल है। बुद्धि जीवियों को डीमनाइज़ करो और अपने जाहिल जड़ बुद्धि वी सी को भर। 2 नेहरू समझते थे की अगर देश को सच में आगे बढ़ना है तो हमें अपनी परंपरा को प्रिज़र्व करते हुए नए साइंटिफिक और टेक्निकल इंस्टीट्यूशन भी खड़े करने होंगे। पर परंपरा के नाम पर बस प्रोपेगेंडा और अंधविश्वास बेचने वालों को साइंस और ट्रेडिशन की ट्रू पार्टनरशिप कहाँ समझ में आएगी। और अब आता है नेहरू पर। अगला इल्जाम नेहरु ने इंडियन कल्चर को इगनोर किया, क्यूँकी नेहरु वेस्टनाईज थे। 1 तरीके से देखा जाए तो ये टैक्स बस नेहरु पर ही नहीं बल्कि सेकुलरिज्म मॉडलिटी, सायंस, रेशनालिटी और कांस्टीट्यूशन पर भी थे। यह तो वही बात हो गयी की कुछ मर्द शर्टपैंट पहनकर कल्चर के नाम पर औरतों को साड़ी पहनना चाहते हैं। ऐसे लोगों से हम क्या ही सीखे द। धर्मा डिस्पैच 1 हिंदुत्व ऑनलाइन प्लेटफार्म की बातें सुने। इनके हिसाब से धर्म के कोड पर टिकी व्यवस्था को नेहरु ने लॉयन ऑर्डर के ड्रामे से गन्दा कर दिया। पहले जो शूज गाँव के बुजुर्ग और बिरादरी सुलझा लेते थे, अब सब कोर्ट जाने लगा और बहुत मामले बढ़ गए। बेसिकली इन्हें सिर्फ खाप पंचायत वाला सेटअप ही चाहिए। जरा सोचिए इनकी बिरादरी का वो बुजुर्ग कौन होगा। 1 खास जाति से होगा, मर्द होगा और उसकी कांस्टीट्यूशन होगी मनुस्मति आज के वाट्सएप ग्रुप के जो अंकल आडमनसहैउनकेजैसा यही है इनका गुस्सा नेहरू और बाबा साहब अम्बेडकर जैसे महान लोगों, पर, क्यूँ इन लोगो ने ये देश की कल्पना 1 सेकुलर डेमोक्रेसी के रूप में की। घूम फिर के इनको 1 हिंदु इंडिया चाहिए था। मिरर मच ऑफ़ मुस्लिम पाकिस्तान, जब वेस्ट कंट्रीज अपने आप को 1 जैसे लोगों और 1 जैसे विचारों, 1 जैसे रंगों और 1 जैसी भाषाओं का समुदाय समझते थे। कुछ दौर में 1 ऐसे डाइवर्स आइडिया ऑफ़ इंडिया को सोचना ही 1 हिम्मत की बात थी। 1 ऐसा भारत जहाँ हर बोली, हर संस्कृति, हर परंपरा को अपना पन मिलता है। जहाँ यूनिटी का मतलब यूनिफॉर्मिटी नहीं डाइवर्सिटी है। आज इसी पुरानी एकरुपता यानी यूनिफार्मिटी वाली सोच को सिटिजनशिप अमेंडमेंट एक्ट के फॉर्म में दोबारा सर्व किया गया है। डॉक्टर अम्बेडकर जवाल लाल नेहरु और उनके साथ कई और लीडर्स ने। पूरी कोशिश की की सिटिजनशिप और रिलिजन को अलग रखा जाए। और आज के आर एस एस वालों के पूर्वज दोनो चीजें तब भी जोड़ना चाहते थे, आप भी जोड़ना चाहते हैं। उन्हें नाजी जर्मनी की रेशियल, थियरीज और फासिस्ट इटली का मॉडल पसंद था। ये लोग तब भी सेकुलरिज्म को 1 खतरा मानते थे। पर इसके बारे में नेहरु ने असेम्बली में सीधा कहा लोग सेकुलर स्टेट कहने पर ऐसे रिएक्ट कर रहे हैं जैसे हमने दुनिया पर कोई ऐसा न कर दिया हो। मैं उन्हें बता दू की हमने कोई बड़ी दयालुता नहीं दिखाई। हमने बस वही किया है जो हर मॉडल देश करता है। ये तो रही नेहरू की बात, अब बात करते है उन लोगो की जिनको लगता है सेवंटी फाइव प्रिएंबल में सेकुलर वर्ड नहीं था तो मतलब देश तो हिन्दू राष्ट्र है। ऐसे लोग अगर बाबा साय और नेहरु के सेकुलरिजम के सपोर्ट में भाषण सुन ले तो मामा जी के बगल के कई सारे बैड बढ़ जायेंगे। भक्तों की फैमिली से रिक्वेस्ट है। इन्हें कभी आर्टिकल फोर्टी टू एटीन, राइट टू क्वालिटी और आर्टिकल ट्वेंटी फाइव टू ट्वेंटी 8 में राइट टू फ्रीडम ऑफ़ रिलिजन का सब्जेक्ट कभी न पड़ने दे। वरना ये खुद सब्जेक्ट बना यंग और कुछ महसूस नहीं कर पाएंगे। नेहरू इंडियन नहीं थे, इस जस्ट कोड फॉर। नेहरू हिन्दू इंडिया नहीं चाहते थे, नेहरू 1 सेकुलर इंडिया चाहते थे। डॉक्टर अंबेडकर ने भी यही कहा। हिंदु राज कम फैक्ट, नोट, बी ग्रेटस कैलेमिटी फॉर दिस कंट्री, हिंदू राज मस, बी प्रेवेंटेडएट एनी कोस्ट प्रेजरवेशन से तो राइट डुइंग इको सिस्टम को हमेशा ऐसी ही दिक्कत है। जो लोग मनुस्मृति के मुताबिक दलितों को पानी के कुएं का एक्सेस भी नहीं देना चाहते वो शिक्षा और पब्लिक सेक्टर में उनकी हिस्सेदारी कैसे बर्दाश्त करे। जाहिर है लोगों को क्वालिटी 1 बैड वेस्टन आइडिया ही लगेगा। इसलिए अब 1 नई तरकीब अपना, सब कुछ बेचकर प्राइवेटाइज कर, 2 न रहेगा पब्लिक सेक्टर और न बचेगा रेजर्वेशन। आप किसी भी बीजेपी सपोर्टर से बात करिए। यही लाइन ऑफ़ आर्ग्युमेंट है। वो इतने नफरती हो चुके हैं के पिछड़े वर्ग को हिस्सेदारी न मिले इसलिए उन्हें अपने बच्चों की शिक्षा और नौकरी की सुरक्षा की सारी गुरबानी कबूल है। और नफरती सोच सिर्फ मुस्लिम और दलित तक तो नहीं रह जाती। इन्हें महिलाएं भी कहाँ पसंद है? जहाँ बेहद विकसित वेस्टन कंट्रीज में भी वोटिंग राइट्स औरतों को बहुत बाद में दिए जाते थे। देश के आजाद होते ही नेहरू के लीडरशिप में सबको वोटिंग राइट्स मिले नेहरू और अंबेडकर ने मिलकर हिंदू कोड बिल को भी हकीकत में लाया। जिससे भारतीय समाज खासकर हिन्दू महिलाओं को अपने अधिकार मिले। पहली बार हिन्दू महिलाओं को प्रॉपर्टी में अधिकार डायस का हक़, अपनी मर्जी से शादी करने का हक और री मैरिज का भी हक मिला और नेहरू ने अगर अलग से हिंदू महिलाओं का जीवन बेहतर बनाया। अब ये सोचिये की ये मुस्लिम अपीजमेंट है या हिंदू अपलिफमेंट, इस पर यह सवाल बिल्कुल जायज है की ये बदलाव मुस्लिम समाज में भी क्यूँ नहीं आया। पाक के बाद देश में अलग सा माहौल था। खून, कतले, आम और खौफ। ऐसे वक्त में नेहरु ने अनुमान लगाया कि जो मुसलमान भारत में रुक गए उन्हें यह भरोसा देना जरूरी है। उनका धर्म उनकी पहचान माइनोरिटी राइट्स के अन्दर सुरक्षित है। नेहरू के बाद भी इतने सालों तक मुमकिन नहीं हो पाया। इसमें कांग्रेस और बाकी सरकारों की बिल्कुल नाकामी है। पर ये नेहरू की गलती नहीं है। क्रिटिक्स भी उन्हें देश का नेता मानते थे। नाइनटीन सेवेंटी सेवन की बात है। कांग्रेस के 30 साल का राज खत्म हो गया। दिल्ली में नई केंद्र सरकार आई। सरकारी ऑफिसर से कांग्रेस के सारे फोटोज और निशान हटाए जा रहे थे। जनता पार्टी के 1 फॉरेन मिनिस्टर ने ये नोटिस किया की नेहरू की 1 फोटो दीवार से हटा दी गई है। उन्होंने कहा की इसको वापस लगाया जाए। ये मिनिस्टर थे नेहरु के फेयर क्रिटिक अटल बिहारी वाजपायी। नेहरु की मृत्यु के बाद भी अटल बिहारी वाजपाई ने पार्लामेंट में गहरा शोक व्यक्त किया। उनका भाषण सुनने लायक है। 1 सपना था जो अधूरा रह गया। 1 गीत था जो गूंगा हो गया, सपना था 1 ऐसे संसार का ज भय और भूख रहित होगा। गीत था 1 ऐसे महाकाव्य का जिसमें गीता की गूंज गुलाब की गंध थी। भारत माता का सबसे लाडला राजकुमार खो गया, दलितों का सहारा छूट गया, जनजन की आँखों का तारा टूट गया। वो शांति के पुजारी थे किन्तु क्रांति के अगर दूध। दुर्भाग्य है की इस उदारता को दुर्बलता समझा गया। यह बात तो सुनने में ऐसा लग रहा है कि अटल बिहारी वाजपेयी आज के नालायक नेताओं से ही कह रहे हैं। ये बात कुछ सब व्यक्ति ने की जिसने सारी जिंदगी नेहरु का विरोध किया। ऐसे सम्मान के कई कारण थे जैसे नेहरू की फॉरन, पॉलिसी, वो लोंग सर्विंग फॉरन मिनिस्टर रहे, जिन्होंने। यह जिम्मा 17 सालों तक संभाला। आज के फौरन मिनिस्टर हैं, जो बस जनता को अपने लेजर के लपटों में लपेट रहे हैं। कहाँ दुलण्डभाईकी चाबी पर चलते विश्व गुरु और कहा नेहरू का स्टेटस गोआ की आजादी का ही। 1 एक्जाम्पल लीजिये। जब नाइनटीन फोर्टी सेवन में भारत आजाद हुआ तब भी गोआ पर पोर्जगीइसकाकब्जा था। उन्होंने यूनाइटेड नेशन और इंटरनेशनल डिप्लोमेसी के जरिए पोजी प्रेशर बनाया। जब उनके सारे पीसफुल एफर्ट फेल हो गए तब भारत ने नाइटी में ऑपरेशन विजय किया और इंडियन आर्मी ने गोआ, दमन और दीव को आजाद। कराया 1 बैलेंस अप्रोच। पहले बात, फिर मुलाकात, फिर जरूरत पड़ने पर मुक्का और जब दुनिया 2 खेमों में बढ़ती जा रही थी, ऐसे वक्त में नेहरू ने एफ्रो एशियन सॉलिडेरिटी का सपना देखा और इम्पीरियलिज्म के खिलाफ इतना मजबूत और मॉरनस्टिकस्टांड लेना। नेहरु को और इंडिया को 1 अलग मकान देता है। उन्होंने स्विस क्राइसिस के दौरान ब्रिटिश और फ्रेंच इंटरवेंशन के खिलाफ खुल कर स्टैंड लिया। यह दिखाता है कि भारत से स्ट्रटजिक न बल्कि मोरल ग्राउंड पर भी मजबूती से खड़ा था। आज हम तालिबान से हाथ मिलाते है। इजराइल पर अब स्टेन कर जाते हैं फिर भी बबलू को नेहरु बनना है। जब दुनिया कोल्ड वार के 2 कैम्स में बढ़ी जा रही थी, अमेरिका या रशिया। तब नेहरु ने कहा की हम अपने देश की अपनी सोच पर चलेंगे किसी के पीछे नहीं। इससे जन्म होता है नॉन लाइन मूवमेंट का जिसमें इंडिया 1 मॉडल और पॉलिटिकल लीडर बन गया। नॉन अलाइनमेंट का भी विरोध हुआ। इन्ट्रस्टिंग ली उन्ही लोगों द्वारा जो नेहरू को विदेशी बता रहे थे। वो चाहते थे कि नेहरू किसी 1 विदेशी ताकत के साथ चले। कोल्ड वार के दौरान नेहरु के नॉन अलाइनमेंट की ब्रिलियंस तब समझ आती है जब हम उसे पाकिस्तान के एग्जाम्पल के साथ कंपेयर करता है। पाकिस्तान ने उस वक्त अमेरिका के साथ हाथ मिलाया सी एन डी ओ और एस ए टी ओ जैसे मिलिट्री पैक्स ज्वाइन किए जिससे उन्हें शॉर्ट तम फायदा तो मिला पर इसके लोंग टर्म नतीजे तबाह कर देने वाले थे। इसी पॉलिसी ने पाकिस्तान को 1 मिलिटरी डॉमिनेटेड स्टेट बना दिया। जहाँ डेमोक्रसी कभी मजबूत हो ही नहीं पाई। दूसरी तरफ नेहरु का बैलेंस अप्रोच जिससे इंडिया को स्टडिज इंडेपेंडेंस मिली और साथ ही डेमोक्रेसी और सोवरेनिटी मेंटेन रहे और आज हम ट्रंप के सामने नतमस्तक है। दोलांडबाई हमारी फौरन पॉलिसी चलाने का दावा कर रहे हैं और उनके परम मित्र उन्हें झूठा भी नहीं कह पा रहे। देशवासी पहले इनके लिए यज्ञ हवन करते थे और देश के नेता इलेक्शन कैंपेन में इन्हें जितवाने जाते थे और आज ट्रंप के टायर के सामने सब हेल्पलेस दिख रहे हैं। कहाँ है लेजर आईज और कहाँ है बैरक डिप्लोमेसी। ट्रंप से न लड़ पाओ तो चाइना चले जाओ, वहाँ मुसीबत पड़ी तो फिर अंकल सैम। ये इधर चला मैं उधर चला वाली फॉरन पॉलिसी, बस, फौरन, ट्रिप्स और अडानी के लिए डील्स तक सीमित है। कुछ शीजिंग पिंग के साथ झूला, डिप्लोमेसी और चाइनीज एग्रेशन पर चुप्पी रखने वाले पीएम के फॉलोवर्स आज नेहरू की फौरन और चाइना पॉलिसी को क्रिटिक करते है। क्रिटिसिजम तो बिल्कुल करना चाहिए, हम भी करते हैं क्यूंकि ना हम अंध भक्त है न नेहरू नोन बायोलॉजिकल। लेकिन नेहरु का जो आइडियलिज्म था पेशी एशियन, यूनिटी और लीडरशिप पर उनका सपना वो हवा में नहीं था। यह फैसला मजबूत मॉडल्स पर खड़ा था और आज भी सिद्धांत टेस्ट ऑफ़ टाइम पास करते हैं। हाँ ये बात सही है की नाइनटीन सिटी टू के चाइनीज एग्रेशन का अंदाजा नेहरु ने नहीं लगाया। ये उनकी बहुत बड़ी छूट थी। 1 ऐसा झटका जिससे वो शायद कभी नहीं भर पाया। क्या हम इस असफलता को नकार सकते हैं? नहीं गाँधी ने नेहरु को काफी बैक किया, आरोप कई मौकों पर नेहरु को क्रिटिसाइज भी किया। जब नेहरू ने नाइन टी में कांग्रेस के अन्दर पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव रखा। तब गाँधी जी ने उसे जल्दबाजी बेवकूफी और बचकाना बताया और भी मतभेद रहे जो खुले तौर पर सामने आये और कभी आपस में ही सुलझा लिए गए। वाम बंदियों की भी नेहरु से अपनी शिकायतें भगत सिंह जैसे क्रांतिकारी चाहते थे कि देश के किसानों और मजदूरों को और ताकत मिले की हमें गोरे साहबों से तो आज़ादी, मिले आरोप हम भूरे साहबों के अधीन हो जाए। इससे तो सत्ता का केवल रंग बदलेगा रूप नहीं। हालांकि नेहरू ने जमींदारी प्रथा खत्म की जिसकी वजह से उन्हें अपने पार्टी के बड़े जमींदार नेताओं की नाराजगी झेलनी पड़ी। लेकिन लेफ्ट के लोगों का मानना था नेहरू जमीन सुधारों को पूरी ईमानदारी से लागू नहीं कर पाए और इस मामले में उनको समझौता करना पड़ा। यह भी सच है की उनके समय में किसान आंदोलनों को भी जबरन दबाया गया जो रेडिकल लैंड रिफॉर्म्स की मांग कर रहे थे। औ यह भी सच है की नेहरु ने नाइनटीन फिफ्टी नाइन में केरला की पहली डेमोक्रेटिकली इलेक्टेड सरकार को बर्खास्त कर दिया जो की यह उनके कहीं शुपचनतकभीजसटफाई नहीं कर पाये। नेहरु ने प्रिवेंटिव, डिटेंशन एक्ट जैसे ऐसे कुछ कानून भी जारी रखे जो अंग्रेजों के समय से दबाने के काम आते थे। ये सारी बातें हमारे चाचा नेहरु के गुलाब में कांटे की तरह चुकते, पर ये बातें छुपाने की नहीं समझ लेगी है। समझना यह है की नेहरू का आईडिया ऑफ़ इंडिया बस 1 आदमी के मन की बात वाला देश नहीं था। वहाँ हर सोच के लिए जगह थे। अक्सर 1 दुसरे से बिल्कुल, ऑपोजिट सोच व 1 जिन्दा संस्कृति थी, जहाँ विचारों का टकराव होता था। लेकिन उसी टकराव ऐसे नए रास्ते निकालते थे। गाँधी, वादी, समाजवादी, दलित, नेताओं की सोच, कम्युनिस्ट, विचार, सबके बीच किन संवाद और समझौता चलता रहता था। भारत का निर्माण 1 नेता, 1 आवाज या 1 विचार से नहीं बल्कि अनेक सोचों के संगम से हुआ था। बापू हो या डॉक्टर, अम्बेडकर नेहरु हो या शहीदे, आजम सबकी अलग सोच थी। 1 दुसरे के क्रिटिक भी थे, पर कुछ मूल्य और सिद्धांत थे, जिस पर कोई कॉम्प्रमाइज नहीं थ। सबका 1 ही मकसद था। अंग्रेजों के राज से मुक्ति ये सब लोग जेल गए, लाठियां, खाई, फासिया, झेली, ताकि हम आजाद सास ले सके। 1 और बात जिस पर पूरी क्लैरिटी से इनमे से कोई भी ऐसा भारत नहीं चाहता था जो तानाशाह या इंटोलरेंडहोजहाँ धर्म के नाम पर किसी को सेकेंड क्लास सिटिजन बनाया जाए। ये सपना हमारे संविधान में लिखा गया। वो धर्म के कानून नहीं, समानता के नियम जाते थे। वो उन सोचों से कोसों दूर थे जिनके पूर्वज, हिटलर और मुसली से प्रभावित थे। आज़ादी की लड़ाई में जो नल्ले नेता नालायक बने फिर रहे थे, वो यह न भूले की नेहरू ने 9 साल जेल में गुजारे, अलग अलग आंदोलनों में लम्बी सजा काटी और उछम्बवक्तमेंभी अपने विचारों का साथ नहीं छोड़ा। किताबें लिखते रहे ऑटो बायोग्राफी गेम्सिस ऑफ़ वर्ल्ड हिस्ट्री यह किताब इंदिरा गाँधी को लिखे लेटर्स का कंपाइननेशन और डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया। मोदी जी ने तो सब पढा ही होगा। नेहरू ने काफी कुछ लिखा, बस। 1 चीज लिखना रह गया। अंग्रेजो के लिए अपॉलिजीलेटर बफादारी का वादा और पेंशन की मांग करना भूल गया। शायद यही कारण है की अब नेहरू को चुनावी नारों में बदनाम किया जाता है किताबों कहानियों से हटाया जाता है। आज़ादी की लड़ाई से उनके योगदानों को भी मिटाने का प्रयास है। क्विट इंडिया मूवमेंट पर नेशनल आर्क्स एग्जीबिशन में अब नेहरू का नाम नहीं मिलता। कई स्कूल की किताबों में भी उनका जिक्र या तो मिटा दिया गया है। यह बिल्कुल छोटा कर दिया गया और उनकी लंबी परछाई आज भी साहब को रात भर जगाए रखती है। ऐसे वीडियोज और देखने के लिए देखते रहिये जनहित में जारी।