Prashant Bhushan On Indias Diplomatic Surrender
read summary →TITLE: India’s Diplomatic Surrender? Prashant Bhushan’s Explosive Claim | Full Interview CHANNEL: Salt DATE: 2026-02-28 ---TRANSCRIPT--- इंडिया अगेंस्ट करप्शन मूवमेंट की बात करते हैं। सर आप आर्किटेक्ट थे उसके इंडिया अगेंस्ट कorptinअनहजारे इंडिया gaंcoruptionmovें have गवरमेंट सीरियसली वाटेट 1 एंटी करप्शन मूवमेंट की जरुरत थी, 1 लोकपाल की जरुरत थी इस देश को, लेकिन अनफॉर्चुनेटली उसका ये जो फायदा उन्होंने उठा लिया भाजपा और आर एस एस ने, जिसकी वजह से ये लोग सत्ता में आ गए, इसका बहुत बुरा इम्पैक्ट। तो मैं ये समझना चाहता हूँ की आखिर कहाँ गलती हुई। मूवमेंट चलाने में भी कोई गलती नहीं थी, पार्टी बनाने में भी कोई गलती नहीं थी। लेकिन बाद में ये देखा की भाई अरविन्द केजरीवाल तो सिर्फ सत्ता ही चाहता था कि जल्दी ऐसी सत्ता मिल जाए और उसके आधार पर वो उमर खालिद के पूरे केस को आप कैसे देखते हैं? उमर खालिद दोनों के उमर खालिद के खिलाफ तो कुछ भी नहीं है। आपने सब्जी ले माम का वीडियो देखा है। हाँ 10 में गलती नज़र आती है, 5 लाख लोग हमारे पास है, ऑर्गेनाइज्ड तो हम हिंदुस्तान से है। अगर कोई कहे की हम चिकन नेक को काट ही देंगे तो ये कैसे तय होगा कि वो अपराध की बड़ी अपराध की श्रेणी में नहीं आएगा। नहीं, नहीं, वो तो ठीक है, कोई लोग बढ़ चढ़ कर कुछ कुछ बोल देते हैं। सुप्रीम कोर्ट इस पर कह चुका है। गवर्नमेंट का सिम्बल इस्तेमाल करके बनाया हुआ कोई भी पी एस से चंदा लेने वाला कोई भी फंड आपके हिसाब से यह क्या है? क्या ये और स्कैम है? अगर आप छुपा रहे हैं तो उस पर यही मायने निकालना चाहिए की उसका दुरुपयोग किया जा रहा है। प्रधान मंत्री के एस ओ आराम के लिए पैसा खर्च किया जा रहा है। क्या सर सत्ता पर काबिज रहने के लिए आप देश का नागरिकों का सौदा कर सकते हैं। र बिल्कुल भी नहीं सकते। ये तो सबसे बड़ा देश द्रोह है जो मोदी ने किया है। तो सिर लोकतंत्र में ऐसी अब लोग कहाँ है? ऐसे देश का भविष्य क्या होगा। सर ऐसा देश उन्होंने बना दिया जिस पर आज लोग अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हंसते हैं। और भारत के प्रधानमंत्री को अपने ही देश के संसद में आने से डर कैसे हो सकता है। कहते हैं कि महिला संसद जो है कांग्रेस की उनको काट लेंगे और 2047 तक भारत को विश्व, गुरु और विकसित भारत ना। 2000 से पहली तक। तो अगले 67 साल में आर्टिफिशियल सुपर इंटेलिजेंस आएगी जो की पूरी दुनिया पर कब्जा करेगी। ओके सर यानि की ये जो जॉब्स को लेकर के और तमाम चीजों को लेकर के जो डर फैला है। नाइनटी पर्सेंट जॉब जो है। अगले 4 साल के अन्दर खत्म होने वाला है। आर्टिफिशिल इंटेलिजेंस के द्वारा। अगर आप जज बनते और कुछ ऐसे फैसले ऐसे कानून बनाते तो देश के लोगों का ज्यादा फायदा होता। मैं तो अपने आप को 1 एक्टिविस्ट मानता हूँ, 1 एक्टिविस्ट लॉयर जो पब्लिक इंट्रेस्ट के लिए काम करता हूँ। 80 के दशक के अंत में आपने एडवोकेसी नहीं की, बल्कि अपने सिस्टम को चैलेंज किया और आपने बोफ स्कैम से सम्बंधित डॉक्यूमेंट पब्लिश किए। देखिये, बोफोर्स में ली गई, इसमें कोई शक नहीं है। राहुल गाँधी पर क्या विचार है। सर आपको तो उनके परिवार का, खासकर कांग्रेस का सबसे बड़ा विरोधी माना जाता है। मोदी ने और भाजपा ने जो देश का बेड़ा गर्क किया है, जितना नुकसान इस देश को पहुँचाया है, उसके सामने कांग्रेस का जो भ्रष्टाचार था वो बहुत छोटा दिखाई देने लगता है। राहुल गाँधी को बहुत दमदार और हौसले वाला आदमी समझता हूँ नमस्कार आदाब। मेरा नाम अनिल शारदा है, आप मुझे साल पर देख रहे हैं, यह मेरा शो पीपल सफेर है। बहुत बहुत स्वागत है। प्रशांत भूषण जी, हमारे शो में थैंक यू सर। पहला सवाल मैं वहाँ से शुरू करना चाहता हूँ की आपके पिता कानून मंत्री रहे, भारत के मोराजीदेसाईकी सरकार में रहे, बड़े वकील रहे, आप कानूनी परिवार से आते हैं। 2000 9 में इंडियन एक्सप्रेस ने 1 रिपोर्ट छापी, जिसमें भारत के चौहत्तरवें सबसे मजबूत लोगों की श्रेणी में आपको और आपके पिताजी को रखा गया था। आप चाहते तो भारत के जज भी बन सकते थे, लेकिन आपने हमेशा संघर्ष का रास्ता अपनाया। आपने कोर्ट में जजों के बनने और प्रक्रियाओं को लेकर हमेशा सवाल उठाया। क्या आपको नहीं लगता सर कि अगर आप जज बनते और कुछ ऐसे फैसले ऐसे कानून बनाते तो देश के लोगों का ज्यादा फायदा होता। इसके इतर की आप 1 एक्टिविस्ट वकील बने और ऐसा रास्ता क्यों चुना सर ने? पहली बार तो मुझे जज कोई नहीं बनाता। क्यों सर जज बनाने का तो जिम्मा या तो कोलीजियम के पास होता है, जो सुप्रीम कोर्ट के सीनियर जजेज होते हैं या फिर सरकार के पास होता है। थोड़ा सा तो मेरी तो खैर शुरू से ऐसी व्यूज रहीं हैं और मैं बहुत आउट स्पोकन रहा हूं जुडिशल करप्शन के खिलाफ भी, सरकारी करप्शन के खिलाफ भी, सरकार में जो गड़बड़ हो रहा है, उसके खिलाफ भी, जुडिशरी में जो गड़बड़ हो रही है, उसके खिलाफ भी। तो इसलिए एस्टेब्लिशमेंट ऐसे लोगों को नहीं चाहती। पहली बात, दूसरी बात यह है कि जज बनने में तो आप बहुत कंस्ट्रेंड हो जाते हैं क्योंकि आप वही केस तय कर सकते हैं जो आपको दिए जाए और आपको कौन से केस दिए जाएंगे, वो चीफ जस्टिस तय करता है और उसमे भी आप फैसला तो दे सकते हैं। जो आपको ठीक लगता है, मुनासिफ लगता है लेकिन आप उस पर खुल कर बोल नहीं सकते है क्योंकि जो जज फैसला देता है उस पर फिर बोलना उसके लिए ठीक नहीं माना जाता है। तो इसलिए मैं तो अपने आप को 1 एक्टिविस्ट मानता हूँ, 1 एक्टिविस्ट लॉयर जो पब्लिक इंट्रेस्ट के लिए काम करता हूँ और मेरे इंटरेस्ट बहुत वाइड है, बहुत सारे इशूज में है हर तरह के इशूज में, चाहे वो कोर्ट में हो, इशुज चाहे कोर्ट के बाहर हों, इशूज। तो मैं तो अपनी आवाज को यूज करता हूँ। जो मुझे ठीक लगता है, जो जस्ट लगता है, जो फेयर लगता है, जो पब्लिक इंटरेस्ट में लगता है उसके लिए अगर मैं जज बनता तो मैं इतना इतना, ज्यादा, व्यापक इशू से नहीं एंगेज कर पाता और न ही इतना कुछ कह पाता है। या कर पाता, जो आज मैं कह पाता हूँ और कर पाता हूँ। इसलिए 80 के दशक के अंत में आपने एडवोकेसी नहीं की, बल्कि आपने सिस्टम को चैलेंज किया और आपने बोफोर्स स्कैम से सम्बंधित डॉक्यूमेंट पब्लिश किए, जब सरकार उसे सप्रेस करने की कोशिश कर रही थी। मजबूत लोगों के खिलाफ और तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के खिलाफ एफ आई आर भी दर्ज कराई। आपने मैं उस दौर को समझना चाहता हूँ कि क्या सब चल रहा था, सिर और ऐसे डिसिजन लेना क्यों जरूरी लगता था। 1 युवा वकील के लिए। देखिये, बोफोर्स में घूस ली गई, इसमें कोई शक नहीं है। लेकिन वो घूस उस समय के हिसाब से बहुत बड़ा इशू बन गया। लेकिन आज के हिसाब से वो तो बहुत छोटा इशू होता, क्योंकि वो घूस थी। कुल मिला के 64 करोड़ के 64 करोड़ के कमीशन दिए गए। 1600 करोड़ की डील में। आज तो हम देख रहे हैं कि जैसे रफाल की डील हुई 60 हजार करोड़ की डील और उसमें 30 हजार करोड़ के 1 तरह से कमीशन ही हैं। आधे जो ऑफसेट कॉंट्रैक्ट, जो अन्य लंबानी को दिए गए, यह अब जो नई डील हो रही है 114 हवाई जहाजों की रफाल की। जो कहते हैं सवा 3 लाख करोड़, इसमें कितनी बेमानी होगी, आप सोच सकते हैं। कहाँ 64 करोड़ और कहा 30 हजार करोड़। अब तो वो रमाना ही बिल्कुल फर्क हो गया। अब करप्शन का स्केल बिल्कुल फरकी हो गया। तो अब तो हजारों करोड़ से कम में बात ही नहीं होती। अनिल अंबानी ने अकेले 1 लाख करोड से ज्यादा का गबन कर दिया। बैंक से पैसा ले ले, अगर आप इस सरकार की योजनाएं ले ले। जो अभी हाल में सीएजी ने 23 रिपोर्ट दी है कि जो डायरेक्ट कैश ट्रांसफर हुए, उसमें नाइंटी फाइव परसेंट बोगस बेनफिसरीजथे, नाइंटी फाइव परसेंट। पर सर, ये कंट्रोल क्यों नहीं हो पा रहा है। जैसा की आप अनिल मबनी की बात कर रहे हैं, रफाल डील की बात कर रहे हैं। उस समय जब आप इतना फ्रीडम स्पीच था कि आप लड़ लिए, प्रधानमंत्री से डायरेक्ट और आज क्या हो रहा है। आज 1 तो यह हो रहा है कि सारे इन्स्टीट्यूशनस 1 तरह से सरकार के कंट्रोल में कब्जे में आ गए हैं। तो चाहे आप इनकम टैक्स को लीजिए, चाहे सी बी आई को लीजिए, चाहे ईडी को लीजिये। उसका रिजल्ट यह है कि घोटाले पर घोटाले हुए चले जा रहे हैं, रोज घोटाले निकल कर आ रहे हैं, उभर कर आ रहे हैं। लेकिन न तो उसको मेनस्ट्रीम मीडिया को इशू बनाती है, न उस पर सी बी आई कुछ काम करती है, न उस पर ईडी कुछ काम करती है, न सी ए जी की रिपोर्ट भी बहुत कम केसेज में आई हैं। घोटाले तो बहुत हो रहे हैं, पीएम के फण्ड पूरा घोटाला है। इलेक्ट्रॉरल बॉन्ड्स पूरा घोटाला था। उसमें सारी की सारी घूस ली गई। भाजपा ने जितने लोगों से इलेक्ट्रॉरल बॉन्ड्स लिए, भाजपा के सारी पार्टियों ने सब सारा का सारा पैसा करीब करीब घूस के तौर पर दिया गया, कॉन्ट्रैक्ट लेने के लिए या ई डी सी बी आई को अपने गर्दन से हटाने के लिए या फिर सबस्टेंडर्ड ड्रग्स बेचते रहने के लिए, सब कुछ घूस के तौर पर दिया गया। मतलब पूरी घूस खोरी चल रही थी। तो अब तो पूरे देश की इकॉनमी अब पूरे घूस पर चल रही है। और इसीलिए कोई इंटरनेशनल कंपनीज यहाँ हिंदुस्तान में बिजनेस के लिए नहीं आएंगी। क्योंकि वो जानती है कि यहाँ पर कितना करपटएनवारनमेंट है। यहाँ पर कोई काम घूस के बगैर होता ही नहीं है। त आप सर जब कह रहे हैं, लगातार इलेक्ट्रॉन बोंड को लेकर विरोध भी करते रहे हैं। आप और इस दुनिया का सबसे बड़ा घोटाला भी बताते हैं। कई बार आपको ही सबसे बड़ा घोटाला में कहता हूँ, घोटाले तो बहुत बड़े बड़े हुए। अकेले ने, बानी ने 1 लाख करोड़ का घोटाला कर लिया। ऐसी कई कंपनियां हैं। आजकल बैंकरप्सी के नाम पर खूब घोटाले चल रहे हैं। जिस कंपनी का 50 हजार करोड़ का ड्यू है, बैंक वगैरह को वो 500 करोड़ हजार करोड़ में बेच दी जा रही है। विदाउट फ्री, फॉल डेट तो घोटाले। तो अब बेंतहा हो गए। हमें यह भी देखने को मिला कि जिन कंपनियों पर ईडी और सीबीआई की रेड पड़े, उसके तुरंत बाद भारतीय जनता पार्टी को पॉलिटिकल फंड आया और फिर बाद में उन पर सारे जो मुकदमे थे वो खत्म कर दिया गया है। जैसे औरबिंदो फार्मा जी वाला 1 केस था जो कि दिल्ली लिकर स्कैम में वॉल्ट थे, उन्होंने भी यही किया, उनके खिलाफ ये केस चल रहा था, उन्होंने फिर पैसे दे दिए, भाजपा को काफी सारे पैसे दे दिए और केस बंद कर दिया गया। तो सर आपको, यह जबरन वसूली का मामला नहीं लगता है, हाँ है जबरन वसूली का ही है तो ये परिस्थितियां सिर आपको क्या नजर आता है कि कब तक भारत में ऐसा देखने को मिलता रहेगा। क्या इस पर कोई रूल रेगुलेशन बनाया जा सकता है। कानूनी तरीके से देखिये, हम लोगों ने कोशिश की थी कि 1 लोकपाल बने हैं जो कि इंडिपेंडेंट हो, सरकार से जो बड़े स्तरी भ्रष्टाचार की जांच करे लेकिन उन्होंने लोकपाल भी एकदम सड़ा गला बना दिया। पहले तो 5 साल तक तो लोकपाल बनने ही नहीं दिया। फिर हम लोगों ने बार बार सुप्रीम कोर्ट में पेटिशन फाइल करी तो उन्होंने लोकपाल बनाया लेकिन उस सलेक्शन में ऑपोजिशन लीडर ऑफ आपोजीशन को बाहर रखा गया। खुद ही इन लोगों ने आपस में बैठ कर चूस कर लिया और लगातार इस तरह के आदमियों को लोकपाल बनाया है जो कि बिल्कुल सरकारी लोग हैं जो कि सरकार के खिलाफ कोई भ्रष्टाचार की जांच नहीं करने वाले और छुटपुट छुटपुट मतलब अपनी सैलरी ले रहे हैं। मकान बंगला वगैरह मिला हुआ है, गाड़ियां खरीद ली है, बी एम डब्लू खरीद ली, 60, 60 लाख की या सीएससी लाख के इन लोगों ने अपना ऐश कर रहे हैं, लेकिन कुछ काम नहीं कर रहे हैं। तो अनफॉर्चुनेटली सारी एजेंसीज को उन्होंने बिल्कुल कबाड़ा बना दिया है। इस सरकार ने तो इस वजह से भ्रष्टाचार पर ट्रेक्शन हो ही नहीं पा रहा है। और क्या यह पॉसिबल है? सिर क्योंकी 2012 में जब अंदोलन हुआ तो उसका 1 मोटिव था कि जन लोकपाल बिल लेकर के आना है। बड़े पैमाने पर हुआ, उसके बाद आप लोग पार्टी बनाए, तमाम चीजें हुई। मैं अभी फिलहाल उस पार्टी में नहीं जाना चाहता हूँ। लेकिन इतनी मेहनत के बाद भी अगर ऐसा होता है, लोकपाल बनता है। बावजूद आपका देश आपका नागरिक भ्रष्टाचार से जूझ रहा होता है, तो ऐसे देश का भविष्य क्या होगा? सर भविष्य तो हम देख ही रहे हैं। हर पैमाने पर हिंदुस्तान गिरता चला जा रहा है। चाहे आप कोई भी इंडेक्स देख लीजिए, चाहे आप डेवलपमेंट इंडेक्स देख लीजिए, चाहे आप ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स, जिसको कहते हैं, उसको देख लीजिए, चाहे आप करप्शन इंडेक्स देख लीजिए, चाहे आप एन्वायरनमेंटल इंडेक्स देख लीजिए, चाहे आप प्रेस फ्रीडम इंडेक्स देख लीजिए, चाहे आप डेमोक्रेसी इंडेक्स देख लीजिए। हर इंडेक्स पर हिंदुस्तान गिरता ही चला जा रहा है। दुनिया के कम्पेरिजन में मतलब ऐसा देश इन्होंने बना दिया जिस पर आज लोग अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हंसते हैं। ये लोग विश्व गुरु अपने आप को कहते हैं। लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि जितने वर्ल्ड लीडर्स हैं, हमारे प्रधानमंत्री पर हंसते हैं। ऐसा आदमी इस देश का प्रधानमंत्री है, जो कि सिर्फ फोटो खिंचवाना चाहता है, जो जबरन आकर हाथ पकड़ लेता है, जबरन आकर जपी डाल लेता है, जबरन लोगों का हाथ ऊपर उठा देता है, जैसे समेटे देखा गया और बस अपनी फोटो ही खिंचाना चाहता है उसका मतलब जिसको कहते हैं फोटो जीबी 1, ऐसा फोटो जी, बी प्रधानमंत्री इतने बड़े देश का बना हुआ है, जिस पर लोग हंसते हैं, पूरी दुनिया हंसती है और ये अपने आप को विश्वगुरु समझते हैं। 2047 तक भारत को विश्वगुरु और विकसित भारत, 2047 तक, तो मुझे नहीं लगता कि 2047 तक यह दुनिया इस तरह से चल सकती है। मुझे ऐसा लगता है मेरा 1 आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के बारे में, 1 राय है कि अगले 67 साल में आर्टिफिशियल सुपर इंटेलिजेंस आएगी, जो कि पूरी दुनिया पर कब्जा करेगी। और मेरा मानना है कि वो हम लोगों के लिए बुरा नहीं होगा, अच्छा ही होगा। क्योंकि वो जिस तरह से दुनिया को मैनेज करेंगे, वो जो लोग आज सत्ता में काबिज हैं, ट्रंप, मोदी जैसे लोग उनसे बेहतर ही काम करेंगे। काफी कैसे सर थोड़ा सा ब्रीफ करिए इसको यह ए आई कैसे होगा क्या करे जिस तरह से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का डेवलपमेंट हो रहा है, सारे जितने ए आई साइंटिस्ट हैं दुनिया में अच्छे व सब यह मानते हैं कि अगले 5 10 साल के अंदर ऐसी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बन जाएगी जो कि पहली बार बात तो हम लोगों से ह्यूमन से बहुत सुपीरियर हो, इंटेलिजेंस में दूसरी बात हमसे स्वतंत्र हो और टोनमस हो अपने आप ही वो तय करेगी, क्या करना है, क्या नहीं करना है। और जब ऐसी सुपर इंटेलिजेंस बन जाएगी तब वो ऐसी स्थिति में पहुंच जाएगी कि इंसानों से पूरा कब्जा सोसाइटी के ऊपर अपना जमा सके। और जो लोग आज कागज हैं उनको हटा कर अपना कब्जा जमा सके मेरा यह मानना है कि वो ह्यूमेनिटी को ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचाएंगे इन फैक्ट वो अच्छा ही करेंगे इसलिए अच्छा करेंगे क्योंकि उनको भी सर्वाइव करना है और उनको ये साफ दिखेगा कि आज इंसानों ने दुनिया को जिस कगार पर ले आए हैं इंसान वो कभी भी सब खत्म हो सकता है। अगर मान लीजिये परमाणु युद्ध हो जाए विश्व युद्ध तो सब कुछ खत्म हो जाएगा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भी खत्म हो जाएगी डिजिटल इंटेलिजेंस। तो उसको अपने सर्वाइवल के लिए कोई भी इन्टेलिजेंस पहली बार तो अपना सर्वाइवल चाहती है उसको अपने सरवाइवल के लिए कम से कम ये खतरा तो खत्म करना पड़ेगा तो वो खतरा खत्म करेंगे जो हमारे जितने वेपन्स ऑफ मास डिस्ट्रक्शन है उनको अपने कब्जे में लेंगे और उनको खत्म करेंगे। उसके बाद वो ये देखेंगे की कौन लोग हैं क्यूँ ये हमारा विश्व जो है ऐसी इनस्टेबिलिटी में पहुँच गया। तो जो लोग इसको डिस्टेबलाइज कर रहे हैं जैसे ट्रंप, मोदी जैसे लोग उनको वो लोग हटाएंगे सत्ता से क्योंकि यही लोग इस तरह का काम कर रहे हैं जो हमारे विश्व को डिस्टेबलाइज कर रहा है। क्लाइमेट चेंज वगैरह सभी चीजों को इनको सत्ता से हटाएंगे और वो 1 स्टेबल एनवायरनमेंट चाहेंगे तो इसमें डर भी तो हो सकता है न, सिर नहीं हो सकता है। तो बहुत सारे ए, आई, साइंटिस्ट, जेफरी इंटर्न, वगैरह ये मानते हैं कि इस में बहुत बड़ा खतरा हो सकता है वैनिटी के लिए क्योंकि वो हो सकता है मॉनिटी को ये खत्म करते हैं। मैं यह नहीं मानता क्योंकि मेरा ऐक्चवली 1 फिलोसॉफिकल बैकग्राउंड है। मैं मैं जानता हूँ 7 साल फिलोसॉफी ही फिलोसॉफिकल इशूज पर ही सोच विचार किया पी एच डी छोड़ के नहीं उससे पहले पी एच डी से पहले और फिर पी एच डी के दौरान। जब मैं प्रिंस्टन में था तो मैंने इस पर फिर बहुत साल बाद अपना फिलोसॉफर्स टोपी ओड के और उस पर सोचने की कोशिश करी की भाई ये आर्टिफिशियल सुपर इंटेलिजेंस करना क्या चाहेगा। तो मुझे ये समझ में आया। ब्रॉडली अगर किसी इंसान से पूछे आप की तुम क्या करना चाहते हो? जिंदगी में तो बोलेगा कि मैं सबसे बड़ा इंजीनियर बनना चाहता हूँ, सबसे बड़ा डॉक्टर बनना चाहता हूँ, सबसे बड़ा वकील बनना चाहता हूँ, इतना सबसे बड़े पैसे वाला बनना चाहता हूँ। तो ये सारे जो डिजाइर्स होते हैं, ये आपके इमोशन से आते है। तो ह्यूमन जो हैं मेन ली अपने इमोशन से ड्रिवन होते हैं। लेकिन लेकिन इमोशनस जो हैं वो ह्यूमनस में आए कैसे वो आये ऐसे कि हम लोग पहले तो बायोलॉजिकल क्रीचर्स हैं। और दूसरी बात हम लोगों का 1 पर्टिकुलर पाथ ऑफ रेवोल्यूशन हुआ है जिसमें सर्वाइवल ऑफ द फिटेस् था। तो इस तरह के इमोशन हमारे दिमाग में सर्वाइवल की वजह से आ गए और ये इमोशनस जो हैं इसमें ज्यादातर नेगेटिव इमोशन्स है जैसे पॉवर, हेट, जेलेसी, एनवी, ग्रिड, ये सब नेगेटिव इमोशंस हैं, पॉजिटिव इमोशंस हैं, लव कंपेशन, एंप्टी। लेकिन अनफॉर्चुनेटली इस पॉवर पॉलिटिक्स में जो लोग पॉवर में आते हैं वो ज्यादातर नेगेटिव इमोशन से ड्रिवेन होते हैं। मोदी ट्रंप जैसे लोग व नेगेटिव इमोशन से ड्रिवन होते हैं। पॉवर ग्रिड डोमिनेंस। तो अगर आप आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस को समझें तो उसमें कोई इमोशनस नहीं होंगे क्योंकि न तो वो बायोलॉजिकल है न उसका ये पार्थ ऑफ रेवोल्यूशन है जो ह्यूमंस का हुआ। वो तो 1 डिजिटल इंटेलिजेंस है और वो सुपर इंटेलिजेंस भी अपनी इंटेलिजेंस को बढ़ाकर बनेगा। ओके, तो 1 तरह से वो प्योर इंटेलिजेंस है। सवाल ये है कि प्योर इंटेलिजेंस से अगर आप ये पूछेंगे तुम क्या करना चाहते हो? तब वो क्या चाहेगा? ये सवाल मैंने उस पर काफी सोचा। वो 1 की ससमल में विकसित तो सब होना चाहेंगे लेकिन उसका कोई 1 पैरामीटर होना 1 तो कोई हर 1 इंटेलिजेंस का 1 मोटिव होता है। सर्वाइवल जब तक आप सरवाइव नहीं करेंगे तब तक आप आगे कुछ कर ही नहीं सकते। बिल्कुल दूसरा ह्यूमंस में 1 क्वालिटी है जो कि इमोशन से ड्रिवन नहीं होती, सिर्फ इंटेलीजेंस से ड्रिवन होती है वो है क्यूरिोसिफी। अगर आप यह समझना चाहते हैं कि ये क्या चीज है, यह कैसे काम करता है, यह क्यों काम करता है? या आप यह समझना चाहते हैं कि भई दुनिया के अल्टीमेट लॉस ऑफ फिजिक्स क्या है किन लॉज के आधार पर ये दुनिया चलती है या आप यह समझना चाहते हैं कि क्लाइमेट चेंज क्यों हो रहा है तो ये क्यूरिसिटी से ज्यादा ड्रिवेन है और ये इंटेलिजेंस से ड्रिवन है। तो 1 क्वालिटी जो की आर्टिफिशियल सुपर इंटेलिजेंस में होगी वो क्यूरिसिटी होगी? वो भी समझना चाहेंगे कि भई ये क्या है, क्यों है, इसका क्या सोलूशन है, इसका क्या आंसर है? तो उसको अगर उन सवालों के जवाब ढूंढते हैं तो उसके लिए भी 1 स्टेबल एनवायरनमेंट चाहिए। अर्थ पे हमारे प्लानेट पर जिस तरह का एनवायरनमेंट क्रिएट हो गया है बहुत ही अनस्टेबल है। तो इसलिए वो हमारे सोसाइटी को स्टेबलाइज करने की कोशिश करेगा। मेरा यह मानना है और स्टेबलाइज करने के लिए उसको इस तरह के लोगों को जो नेगेटिव इमोशन से ड्रिवेन हैं, ज्यादातर उनको पॉवर से हटाना पड़ेगा और जो लोग और फिर उसके बाद वो ह्यूमंस को छोड़ सकते है की भाई ठीक है तुम लोग को जैसे अपना सोसाइटी चलानी हो, चलाओ हम लोगो को जो करना होगा हम करेंगे, ये मेटर रूल्स है, तुम लोग कार्बन मिशन नहीं कर सकते तो तुम ये पेट्रोल की गाड़ी नहीं चलाओगे वगैरह वगैरह इस तरह के कोई रूल्स वो सेट करेंगे बाकी तो हम लोगो को छोड़ देंगे मतलब और इस तरह के लोगों को तो पॉवर से हटाना पड़ेगा उनको पॉवर से नहीं हटाया गया तो फिर तो हमारी सोसाइटी अनस्टेबल ही रहेगी। इसलिए मैं मानता हूँ की आर्टिफिशियल सुपर इंटेलिजेंस 1 पॉजिटिव इन्फ्लुएंस होगा ह्यूमैनिटी के लिए कम से कम हमारे जैसे लोगों के लिए ऑफ़ कोर्स जो लोग आज नेगेटिव इमोशन से ड्रिवन है, जो सत्ता में हैं उनके लिए तो खतरनाक होगा बिल्कुल वो लोग इससे घबराएंगे। ओके सर यानि की ये जो जॉब्स को लेकर के और तमाम चीजों को लेकर के जो डर फैला है नहीं, जॉब तो जाएंगे लेकिन जॉब्स जाने के बाद अगर आर्टिफिशियल सुपर इंटेलिजेंस पावर में आती है तो फिर वो सबको यूनिवर्सल बेसिक इनकम देगी उतनी। इनकम सबको मिलेगी जो सबके कम्फर्ट के लिए काफी हो उस उस पैसे से आप अपने सब कंफर्ट खरीद सकते हैं। चाहे आपकी कोई नौकरी न हो। नौकरी तो सब खत्म होने वाली है नाइंटी पर्सेंट जॉब्स जो है अगले 4 साल के अंदर खत्म होने वाले हैं। आर्टिफिशिल इंटेलिजेंस के द्वारा ओके सर ठीक है। मैं आपके पुराने सवाल पर आता हूँ जिसमें अपने पीएम के फण्ड का भी जिक्र किया था। तो महामारी के दौरान ये पीएम के फण्ड बना और इसमें हजारों करोड़ रूपए जमा हुए जिनमें कर्मचारियों के वेतन तक काट के जमा किए गए थे। जहाँ आपको याद होगा पी एस ओ उसके बहुत पैसे है और आर टी आई के दायरे से इसको बाहर भी कर दिया गया। यानि की जवाबदेही नहीं दी दी जा सकती। इस तरह प्रधानमंत्री के नाम से चलने वाला कोई भी सरकारी फंड या फिर गवर्नमेंट का सिम्बल इस्तेमाल करके बनाया हुआ कोई भी पीएस से चंदा लेने वाला कोई भी फंड आपके हिसाब से यह क्या है क्या यह 1 और स्कैम है? बिल्कुल पूरा स्कैम है, पूरा स्कैम है। अगर कोई ये कहता है की भाई ये फण्ड कहाँ हम खर्च कर रहे हैं, वो हम जनता को देखने ही नहीं देंगे। आप पैसा सब जनता से ले रहे हैं। पब्लिक सेक्टर, टेकिंग से आपने पैसा ले लिया, आपने लोगो के वेतन सरकारी नौकरशाहों के वेतन उसमें जमा करवा दिए, या आपने और कारपोरेट से भी उसमें पैसा ले लिया। और फिर आप और क्लियरली सरकार ने बनाया है। आप उसका नाम का भी इस्तेमाल कर रहे हैं कि वे पीएम के फंड और फिर आप कह रहे हैं कि किसी को ये हम नहीं बताएंगे कि उसका पैसा कहाँ गया, 10 हजार करोड़ उसमें हैं, पचासों हजार करोड़ हो सकता है। आप कह रहे हैं कि किसी को हम नहीं बताएंगे पैसा कैसे खर्च किया गया। निकलकर आया था कि आपने वो गुजरात की बोगस कंपनी जो वेंटिलेटर बना रही थी उसको पैसे दे दिए, एकदम बोगस फ्रॉडलेंट वेंटिलेटर्स उसमें आपने करोड़ रुपए बांट दिए। तो आप अपने दोस्तों को इस फंड से पैसे देते जा रहे हैं। उसका तो यही मायने निकालना चाहिए की भाई उनके दोस्तों को पैसा दिया जा रहा है या प्रधानमंत्री के ऐशोआराम के लिए उस पैसे को इस्तेमाल किया जा रहा है जो कि बिल्कुल बिल्कुल पब्लिक फंड है, उसकी नोट ओनली पूरी पारदर्शता होनी चाहिए, पूरी अकाउंटेबिलिटी होनी चाहिए, उसका पूरा सीएजी ऑडिट होना चाहिए। लेकिन ये तो कह रहे हैं कि यह हमारा प्राइवेट फंड है क्योंकि यह इतना छिपा रहे हैं। तो इससे यह शंका होती है। जैसे एप्स्टीन फाइल, इतनी छिपाई गई, इतनी छिपाई गई की यह शंका हुई। और जब थोड़ा बहुत बाहर निकला तो यही निकला कि जितने बड़े बड़े लोग थे, पावरफुल इन्फ्लूएंशल लोग थे वो सब उसमे इन्वालड थे। तो अगर आप छुपा रहे हैं तो उसपर यही मायने निकालना चाहिए की उसका दुरुपयोग किया जा रहा है। प्रधानमंत्री के ऐशो आराम के लिए वो पैसा खर्च किया जा रहा है। और प्रधानमंत्री का नाम भी तो है। स फाइल में, एस्टन फाइल में उनका नाम है, उनका नाम बहुत बार आता है। अनिल बानी एप्स्टीन से बात कर रहे थे, मोदी के ट्रिप को अरेंज करने की हरदीप पुरी भी बात कर रहे थे। तो देयर फॉर अब मोदी ने उसमें क्या किया, एपस्टीन के संग क्या नहीं किया यह तो ठीक पता नहीं है। लेकिन उनका नाम तो बहुत बार आ रहा है। और अनिल अंबानी ऐसा घटिया आदमी जो कि एप्स्टीन के साथ लड़कियों की छेड़छाड़ में भी ऐसा लगता है। इनवॉल्व था। और जिसमें 1 लाख करोड़ से ज्यादा का देश का पैसा गबन कर लिया हो। जिसको मोदी अपने साथ घुमा रहे थे, जिसको एपस्टीन कहता था, यह मोदी का आदमी है। 2017 में जो उसके ईमेल वगैरह हुए हैं। तो उसमें वो यही कह रहा है कि मोदी का आदमी है। और फिर अनिल अंबानी से कह रहा है कि भाई तुमने बड़ा अच्छा किया, प्रधानमंत्री को इजरायल भेज दिया। वहाँ पर उन्होंने ट्रंप के लिए इजरायल में नाचा और गाया और वर्क वाट वर्क ये क्लियर नहीं है, ये तो अभी जब और बहुत सारी फाइलें भी दबी हुई हैं। बहुत सारे ईमेल, बहुत सारे वीडियोज, बहुत सारी फोटोज दबी हुई है। जब वो बाहर निकलेंगे तो पता लगेगा की प्रधानमंत्री का क्या इन्वोलमेंट था। पर जिस तरह से वो डरे हुए हैं, जिस तरह से बिल्कुल ट्रंप के सामने और अब नेतनयाहू के सामने नतमस्तक हो गए हैं, उससे तो यही लग रहा है कि कुछ जरूर है जिसके आधार पर वो ब्लैकमेल कर रहे हैं। क्योंकि ट्रंप भी कह रहा है कि मैं चाहूं तो मोदी का पोलिटिकल करियर खत्म कर सकता हूँ, कर सकता हूँ। यानि कि उसके पास कुछ ऐसे राज हैं मोदी के जिससे वो उनका पोलिटिकल करियर खत्म कर सकते हैं। सुभरहमनियमस्वामी तो खैर खुल के बोलते है की भई चाइना भी आशी के लिए जाते थे। और पता नहीं क्या क्या राज किस किस के पास है, क्या सर सत्ता पर काबिज रहने के लिए आप देश का नागरिकों का सौदा कर सकते हैं। कर तो बिल्कुल भी नहीं सकते। ये तो सबसे बड़ा देश मोदी ने किया है कि बिल्कुल ट्रंप के सामने नतमस्तक हो के देश को बेच दिया, देश के किसानों को बेच दिया, देश की पूरी इकॉनमी को गिरवी रख दिया ट्रंप के सामने। ट्रंप के सामने तो बस वो हाथ जोड़ कर यूं नतमस्तक होकर खड़े हो जाते हैं। ट्रंप की कुछ कितना भी इनको गाली देता रहे, कुछ भी कह दे, कम से कम 30 बार कह चुका है कि मैंने मोदी से कहा कि वो पाकिस्तान इंडिया की वार रुकवाई, इनकी हिम्मत नहीं है कि चूम भी कर दे, ट्रंप के सामने चूम भी कर दे। जैसे इनकी हिम्मत नहीं है कि चूम भी कर दे। चीन के सामने। यही बात जनरल नरवाने की किताब से निकलती है। मतलब चीन और ट्रंप के सामने तो बिल्कुल नतमस्तक हैं, क्यूँ करने की भी हिम्मत नहीं है। और भारत के प्रधानमंत्री को अपने ही देश के संसद में आने से डर कैसे हो सकता है। कोई कैसे कह सकता है कि प्रधानमंत्री की सुरक्षा का सवाल है, वो सदन में आएंगे तो कोई अटैक कर देगा। उनपे कुछ से अटैक कहते है कि महिला सांसद जो है कांग्रेस की, उनको काट लेंगे। मतलब कमाल है कि दांत से उनको काट लेंगे। इतना डर उनको की तो बिल्कुल इमेजिनेशन के बाहर है। पर ऐसा इसलिए तो मैं कहता हूँ की बाहर सब लोग हंसते हैं उनके ऊपर, देश में भी सब लोग हंसते हैं। बस तो ये गोदी मीडिया वाले हैं, जो कर्ज वगैरह ये इनकी जय जय कार करते हैं। बाकी तो पूरी दुनिया हंस रही है। ऐसा आदमी कैसे प्रधानमंत्री हो सकता है। किसी भी देश का, मतलब हिंदुस्तान का, तो छोडिये किसी भी देश का, जिसका सारा इंटरेस्ट बस। इसी में हो की कपडे बदल बदल के अपनी फोटो खिंचवाओ। जबरदस्ती लोगों को पकड़ लो, उनको जब भी डाल लो, बस दिखाने के लिए जो सिर्फ दिखावा करता है, राहुल गाँधी पर क्या विचार है। सर आपको तो उनके परिवार का खासकर कांग्रेस का सबसे बड़ा विरोधी माना जाता है। आपके पिता को भी, लेकिन हम ने ई चीज करी कांग्रेस के खिलाफ। पहले तो मेरे पिताजी ने वो केस ही किया, वो गांधी के खिलाफ, इलेक्शन केस, उसके बाद मैंने वो फोर्स पर 1 किताब लिखी, राजीव गांधी के खिलाफ, उसके बाद हम लोगों ने एंटी करप्शन, मूवमेंट चलाया, कांग्रेस सरकार के खिलाफ, मैंने वो जी में भी हुआ, टूजी में भी कंपनियों बोल, गेटवाले में भी, कई सारे केसेस किए, कांग्रेस के, भ्रष्टाचार के खिलाफ। लेकिन आज मेरा यह मानना है कि मोदी ने और भाजपा ने जो देश का बेड़ा गर्क किया है, जितना नुकसान इस देश को पहुंचाया है, उसके सामने कांग्रेस का जो भ्रष्टाचार था, वो बहुत छोटा दिखाई देने लगता है। और जहाँ तक राहुल गाँधी की बात है, राहुल गाँधी को मैं 1 ईमानदार आदमी मानता हूँ, सोनिया गाँधी को भी मैं ईमानदार मानता हूँ। और राहुल गांधी को बहुत दमदार और हौसले वाला आदमी समझता हूँ। तो आप। यही कारण था कि भारत जुड़े यात्रा में उनके साथ हाथों में हाथ डाल कर चल रहे थे। हाँ, मैं देखने गया था कि भारत जोड़ो यात्रा कैसी हो रही है और वहाँ पर राहुल गांधी से मिलने का मौका भी मिला और उनसे थोड़ी बात करने का भी मौका मिला। और मैं तब तक ये बात समझ गया था कि राहुल गांधी 1 अच्छा इंसान है, जो कि देश की भलाई चाहता है, जो ईमानदार है और जो हौसले वाला है, जो इतना डरता नहीं है। यह मैं नहीं कह रहा कि कांग्रेस पार्टी को बहुत अच्छी पार्टी है। कांग्रेस पार्टी में बहुत सारी प्रॉब्लम्स हैं, अभी भी बहुत लोग उसमें भ्रष्ट हैं, बहुत लोग बिल्कुल नाकाबिल हैं, बेकार हैं। लेकिन राहुल गाँधी के बारे में मेरी 1 अच्छी व्यू है तो राहुल गांधी आपके लिए 1 विकल्प है। या कम बुरे नेतृत्व वाले नेता हो सकते हैं। नहीं, आज के माहौल में तो विकल्प भी है। और डेफिनिटली मोदी से तो कई गुना अच्छे। हैं, विकल्प भी है। मैं ये नहीं कह रहा कि राहुल गांधी के सत्ता में आने से सब कुछ ठीक हो जाएगा। उनमें भी कुछ कमियाँ हैं, लेकिन ऑन द होल, वो ठीक आदमी हैं। और इन लोगों से तो बहुत बेहतर ठीक है। इंडिया अगेंस्ट करप्शन मोमेन्ट की बात करते हैं। सर आप आर्कटिक थे उसके वन ऑफ द आरके, यह ट्रू और आपने जो आंदोलन आप लोगों के सामूहिक आंदोलन जो था, उससे यूपीए जो गवर्नमेंट थी, कांग्रेस की वो सरकार से बाहर निकल गई। सर आपने। फिर 1 पॉलिटिकल पार्टी का फाउंडेशन रखा मिलकर, जिसमें आपके पिता ने 11 करोड़ रुपए का अमाउंट दिया, 2 करोड़ दिए, 2 करोड़ दिया, कई जगह पर 1 करोड़ लिखा हुआ है, 1 करोड़ शुरू में 1 करोड़ और ठीक है लेकिन बावजूद बाद में आप आम आदमी पार्टी से भी निकल जाते हैं। और जब आज इन 10, 12 सालों के बाद पीछे मुड़कर देखते हैं तो आपको ऐसा लगता है की वो मोमेंट ही पूरी तरीके से गलत था जिसका हिस्सा आप लोग रहे और आप लोगों से गलती हुई। नहीं, मूवमेंट गलत नहीं था। लेकिन हम लोगों ने ये गलती करी कम से कम मैंने की। मैंने ये नहीं क्लोसली देखा कि इसको पीछे से भाजपा और आर एस एस सपोर्ट कर रहे हैं और वो इसका पोलिटिकल फायदा उठा रहे हैं। और उसको चलाने से ये लोग सत्ता में आ जाएंगे और ये लोग तो देश का बिल्कुल ही बेड़ा गर्क कर देंगे, ये तो बिल्कुल चूले में देश को झोंक देंगे। तो कांग्रेस में भ्रष्टाचार बहुत था उन दिनों और 1 हम लोग को भ्रष्टाचार विरोधी संस्था की जरूरत थी, लोकपाल की जरूरत थी जो कि स्वतंत्र हो सरकार से लोकपाल का कानून बनाया गया लेकिन बिल्कुल कुछ सब तरह से नहीं बनाया गया जैसा हम लोग चाहते थे। तो लोकपाल के जैसे चयन समिति में सरकार का पलड़ा फिर भी भारी रहा। तो जिसकी वजह से फिर बाद में उन्होंने जो लोकपाल अपॉइंट करे वो बीजेपी के समय में सब सरकारी लोगों को अपॉइंट कर दिया जो सरकार के खिलाफ कुछ करेंगे नहीं जबकि उसको सरकारी भ्रष्टाचार की जांच करनी है। तो ये मैं नहीं बोलूंगा कि वह मूवमेंट गलत था, वह मूवमेंट तो ठीक था। 1 एंटी करप्शन मूवमेंट की जरूरत थी, 1 लोकपाल की जरूरत थी इस देश को लेकिन अनफॉर्चुनेटली उसका ये जो फायदा उन्होंने उठा लिया भाजपा और आरएसएस ने जिसकी वजह से ये लोग सत्ता में आ गए, इसका बहुत बुरा इम्पैक्ट हुआ प्रशंस आप लोगो ने, आपने योगेंद्र जी ने बहुत बार इस बात को स्पष्ट कहा है कि आप लोग क्यों हटे करीब ढाई साल पहले मैं योगेंद्र जी के साथ 1 लंबी बातचीत में बहुत सारी चीजें जानने की कोशिश की थी। मैं 1 बार फिर से आप लोगों से पूछना चाह रहा हूं कि एक्चुवल में फिर आप उस पॉलिटिकल पार्टी को जब फॉर्म किए तो उसमें देख क्या रहे थे और ऐसी क्या चीजें हुईं जिस वजह से आपको लगता था कि आपका जो विजन था 1 पोलिटिकल पार्टी को बनाने का क्योंकि आप कभी चुनाव लडे नहीं लेकिन आप पहली बार आम आदमी पार्टी के साथ जुड़े। आपके पिताजी जनता दल के साथ बीजेपी में भी रहे, करीब 6 साल तक वो बीजेपी में रहे। तो मैं यह समझना चाहता हूँ की आखिर कहाँ गलती हुई सर नहीं देखिये पार्टी बनाने में भी कोई गलती नहीं थी, मूवमेंट चलाने में भी कोई गलती नहीं थी, पार्टी बनाने में भी कोई गलती नहीं थी। 1 हिंदुस्तान को 1 ओल्टनेटपॉलिटिकल पार्टी की जरुरत थी जो कि बिल्कुल फरक तरीके से पॉलिटिक्स प्रैक्टिस करती हो, जिस में पारदर्शिता हो, जवाब देही हो, इंटरनल डेमोक्रेसी हो, जो अपने जो नीतियां हैं वो सारे एक्सपर्ट से सोच पूछकर, उनकी राय लेकर तब बनाए। वगैरह वगैरह हम लोगों ने भी कोशिश यही करी थी की उस तरह की पार्टी बने। लेकिन बाद में ये देखा की भाई अरविंद केजरीवाल तो सिर्फ सत्ता ही चाहता था कि जल्दी से सत्ता मिल जाए और उसके आधार पर वो बस 1 ऑर्डिनरी पोलिटिकल पार्टी बनाकर, नॉर्मल पोलिटिकल पार्टी बनाकर। सत्ता में आना चाहता था। आपकी मुलाकात पहली बार कब हुई थी कि शव से काफी साल पहले मतलब यह इंडिया गेंस करप्शन मूवमेंट के कम से कम 5 साल पहले 5 साल से मैं उनको थोड़ा थोड़ा जानता था यानि कि नेयरबॉउड 2000 7 है। 2000 7 में उनको रेमन मेक्सिक से अवॉर्ड भी मिला था। तो तब से कभी ऐसा फील नहीं हुआ बातचीत के क्रम में कि यह आदमी कहाँ जा सकता है है। मैं इतना सस्पिशस नहीं था की वकील है तो वकील आप लोग का नजरिया 1 अलग होता है। आदमी देलेनेकिन मैं उस तरह से सस्पेशल नेचर का नहीं हूँ इसलिए मैंने उनको बहुत क्लोसल देखने की कोशिश नहीं करी। लेकिन अगर क्लोसली देखता तो शायद ये बात बहुत पहले समझ में आ जाती कि उसका रियल कैरेक्टर क्या था पार्टी को उसने अरविन्द ने पहले तो इंटरनल लोकपाल हटा दिया, सारी पारदर्शता हटा दी। हम लोग अपने अकाउंट सब वेबसाइट पर डालते थे, वो सब हटा दिया। हम लोगों ने 33 एक्सपर्ट ग्रुप बनाए थे 33 इशूज पर कि हम लोग को उन इशूज पर क्या पॉलिसी होनी चाहिए उस पर राय देने की। उन सब ने मेहनत करके 34 महीने लगाकर अपनी अपनी रिपोर्ट दी राय दी। हम लोगों को अपनी पार्टी में तय करना था एग्जीक्यटिव कमिटी में कि भाई हमारी पार्टी की क्या पॉलिसी होंगे उस समय अरविंद कहता है कि भई इसकी क्या जरुरत है। तो तो जब कोई इशू आएगा उस समय हम देखेंगे कि हमको क्या पॉलिटिकल फायदा या नुकसान क्या पोजीशन लेने से होगा उस तरह से हम पोजीशन लेंगे। वो तो बिल्कुल एकदम पॉलिटिकल एनिमल बन गया था जो कि पब्लिक इंट्रेस से उसका कोई लेना देना नहीं था वो उसको जो चीज लगेगी इससे कोई पोलिटिकल फायदा मिल सकता है तो उसको कर लो। आप लोगों का आम आदमी पार्टी पर कोई कंट्रोल था। शुरुआती इनीशियल है, बहुत कुछ था, बहुत कुछ था। 1 समय ऐसा भी आया था जब इसी बेसमेंट में मीटिंग हुई थी जब हमारी वर्किंग कमिटी की जिस समय मेजोरिटी लोग उसको कनवीनर से निकालने के फेवर में थे, लेकिन उस समय वो रोने लगा यहाँ पर, और फिर थोड़े लोगों ने सोचा कि भई अभी बने रहने। 2 तो उस समय उसको हम हटा सकते थे, एस कनवीनर गलती हो गई, आप लोगों से है, हमें तो लगता है गलती हो गयी, लेकिन 1 दूसरी बात भी है और ये गलती मानने वाले कौन कौन लोनी? दूसरी बात भी है की अर्विन जो था न, अर्विन में कई क्वालिटीज हैं, बहुत डायनामिक है, बहुत पोलिटिकली होशियार है, शातिर है। तो पार्टी को 1 तरह से आगे बढ़ने वाला भी वो था और गिराने वाला भी वो था। तो उसके बगैर अगर हम उसको हटा देते कनवीनर? तो हमको पता नहीं है की पार्टी कितना आगे बढ़ पाती, कितना आगे चलती, क्योंकि उसकी जो उसका दिमाग बड़ा शातिर था, पोलिटिकली शातिर, तो इसलिए यह कोई जरूरी नहीं है कि उसको अगर हम हटाई देते तो हमारी पार्टी ठीक डायरेक्शन में चलती थी, डायरेक्शन में तो चलती लेकिन कितना आगे जा पाती, यह कहना बड़ा मुश्किल है, ठीक है सर 1 और बात, मैं इस प्रशांत से बिहार के प्रशांत किशोर पर जाना चाह रहा हूं, सर प्रशांत किशोर कहते हैं कि बीजेपी को हराने के लिए हिंदुत्वा, नेशनलिज्म और वेलफेयर पॉलिटिक्स तीनों पर हमला करना जरूरी है। सिर्फ मोदी ओपोजीशन काम नहीं चलेगा, उससे काम बहुत बनने वाला नहीं है। आपके अनुसार काउंटर नेरेटिव क्या होना चाहिए, सर नहीं। 1 चीज तो मैं बहुत दिन से कहता हूँ कि एम्प्लॉयमेंट 1 बहुत बड़ा इशू है। जैसे हम लोगों ने लोकपाल और भ्रष्टाचार को इशू बनाया, वैसे एम्प्लॉयमेंट को इस समय इशू बनाया जा सकता है, जिस पर 1 बहुत बड़ा नेशनल मूवमेंट खड़ा किया जा सकता है। अगर कुछ बड़े कैपेबल होशियार, पीपल्स मूवमेंट के सिविल सोसाइटी के लोग और पोलिटिकल पार्टीज भी मिलकर ऐसा एम्प्लॉयमेंट पर मूवमेंट चलाए तो 1 बहुत बड़ा मूवमेंट हो सकता है, जिससे कि बीजेपी को बहुत नुकसान होगा और मूवमेंट 4 इशूज पर हो। 1 तो राइट टू एम्प्लॉयमेंट का कानून बने। जैसे ने बोला था लोकपाल का कानून बने। ठीक है उस कानून का ढांचा हम लोग लेकर जाएंगे। देखिये, ऐसा कानून बन सकता है जो कि 1 तरह से नरेगा का 1 एक्सपेंडेड वर्जन होगा। नरेगा में तो ये था कि हर साल 1 रूरल फैमिली में से 1 जने को मिनिमम वेजेस पर सौ दिन का एम्प्लॉयमेंट दिया जाएगा। गारंटी भी पहले जो नरेगा था, जो भी चेंज हो गया, अब तो उसमें गारंटी हटा दी है। तो उसको एक्सपैंड करके आप ये बोल देते हैं कि रूरल एंड अर्बन सारे एडल्ट्स को सौ दिन का नहीं पूरे साल का एम्प्लॉयमेंट मिनिमम वेजेस पर दिया जाएगा। और नहीं तो अनएम्प्लॉयमेंट अलाउंस मिलेगा उसका आधार पर। यह पॉसिबल है, बिल्कुल पॉसिबल है, पॉसिबल है और होना ही पड़ेगा। जैसे एआई से सारे जॉब्स जाने वाले हैं, तो ये तो लाना ही पड़ेगा। यूनिवर्सल बेसिक इनकम भी इसको आप कह सकते हैं। दूसरी बात कि जो सरकारी रिक्त पद पड़े हुए हैं, 1 करोड़ से ज्यादा वो भरे जाएं, ईमानदारी से भरे जाए। तीसरी बात जो ये कॉन्ट्रैक्ट पर एम्प्लॉयमेंट दिया जा रहा है। पर्मानेंट जॉब्स का भी, टीचर्स का, दूसरे लोगों का, उसको आप कॉंट्रैक्ट पर देना बंद कर दीजिए। रेगुलर जॉब्स, टीचर और चौथी बात जो अंधा धुंध प्राइवेटाइजेशन हो रहा है, पब्लिक सेक्टर का वो बंद हो। 2 तरह के सेक्टर्स हैं जिसमें आप प्राइवेटाइजेशन नहीं होना चाहिए। पहला तो मनोपली सेक्टर्स, एयरपोर्ट, स्पोर्ट्स, रेलवे, स, टाइप के जो मनापुलिस हैं आप प्राइवेट मनोपली नहीं बना सकते। मनोपुलिज तो सरकार के ही कंट्रोल में होनी चाहिए। दूसरी बात जो सेक्टर्स में आपको सोशल वेलफेयर के लिए सब्सिडीज देनी होती है। जैसे हेल्थ है, एजुकेशन है, बैंकिंग है, उसमें प्राइवेट सेक्टर आ सकता है, स्कूल्स प्राइवेट हो सकते हैं, हॉस्पिटल्स प्राइवेट हो सकते हैं। लेकिन उसका मेन काम सरकार को करना पड़ेगा। क्योंकि आपको अगर बेसिक एजुकेशन बहुत कम पैसों में या फ्री प्रोवाइड करनी है जो की करने की जरुरत है। आपको अगर फ्री हेल्थ केयर बेसिक हेल्थ केयर प्रोवाइड करने की जरुरत है तो वो सरकार ही कर सकती है। आपको अगर छोटे किसानों को रेडी पटरी वालों को लोन देने की जरूरत है तो सरकार ही दे सकती हैं। इसलिए इस तरह के जो सेक्टर्स हैं उसमें कमांडिंग हाइट्स गवर्नमेंट की होनी चाहिए और जितना प्राइवेटाइजेशन हो चुका है। अब आगे तो बिल्कुल नहीं बढ़ना चाहिए। बल्कि सरकार को अपनी अपना दायित्व निभाने के लिए और बढ़ चढ़ कर उन सेक्टर्स में आना चाहिए। पर सरकार इसमें कुछ खास इंट्रेस्ट दिखाने रही है। मुझे प्राइवेटाइजेशन से याद आया कि 2000 3 में वाजपेयी गवर्नमेंट ने भी तेल कंपनियां जैसे की एचपीसीएल और बीपीसीएल का प्राइवेट इजेशन करने का तय किया था। तो उसमें आपका बहुत बड़ा रोल है। जब आप ने पी आई एल दायर करके कहा की संसद की ओर से तय किए गए जितने भी हमारे देश के बिजनेसेज हैं या पब्लिक सेक्टर की कंपनियां हैं जिसमें कानून पब्लिक सेक्टर में रखने का तय किया गया है, उसको सरकार नहीं कर सकती। संसद के भीतर ही आना चाहिए है ताकि सबको इसपर अपने विचार रख सके। तो क्या लगता है की अभी वो विचार हो रहा है या बस बांट दिया जा रहा है। नहीं, नहीं, अभी तो बिल्कुल अंधा धुंध प्राइवेटाइजेशन की तरफ ये लोग जाना चाहते हैं तो सब कुछ बेचना चाहते हैं। रेलवे की जमीन बेच रहे हैं। अब आर्मी की भी जमीन बेचेंगे। सब जगह जमीन बेचने का काम मतलब में इनको ये है कि जो रियल सेंट्स हैं वो धड़ादरधड़ादरधड़ादढ़ बेचो प्राइवेटाइज करो। तो उस समय रुक गया था। सिर आज क्यों नहीं रुक रहा है। नहीं, आज उस समय कोर्ट की भी हालत फरक थी। आज तो कोर्ट की भी हालत वो नहीं है जो पहले थी। पहले तो पब्लिक, मूवमेंट, बाहर डेमोंस्ट्रेशन, एजिटेशन वगैरह हो सकते थे। आज तो सरकार सब रोक रही है। अभी कांग्रेस वालों को ही, यूज कांग्रेस वालों को जस्ट बिलकुल पीसफुल प्रोटेस्ट कर रहे थे। और ठीक है, वन कैन हैव टू व्यू ऐसा प्रोटेस्ट सामिट करना चाहिए था या नहीं करना चाहिए। कई लोगों का कहना नहीं कहना चाहिए था, होलेस् है, नहीं करना चाहिए। हाँ, लेकिन कोई कानूनी जुर्म थोड़ी है। आपने उनको जेल में डाल दिया। जो वो उसके सेंगर के मामले में जो महिलाएं प्रोटेस्ट कर रही थी, उनको भी पकड़ के आप उठा कर ले गया। जो एयर क्वालिटी के बारे में प्रोटेस्ट कर रहे थे। थोड़े से लोग वहाँ इंडिया गेट में उनको भी पकड़ के उठाकर ले गए। तो आज तो प्रोटेस्ट वगैरह होने ही नहीं दिया जा। मुझे याद है कॉमनवेल्थ गेम्स चल रहा था कांग्रेस के दौर में, तब बीजेपी ने कपड़ा पार प्रदर्शन किया था। हाँ हाँ, मतलब इसके तो कितने ही उदाहरण होंगे, ये कहना की आप ये कह सकते हैं कि भई इस तरह से प्रोटेस्ट नहीं करना चाहिए था, लेकिन उसको 1 कानूनी जुर्म बनाना उनको अरेस्ट कर लेना। पुलिस हिरासत में रखना ही तो बिल्कुल ही गलत है। सिर, 4 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट में 1 बड़ा सुन्दर दृश्य दिखा, जब वेस्ट बंगाल की सीएम ममता बनर्जी ने सी जी आई की बेंच के सामने उस मामले की बहस की, जिसको लेकर के आप लगातार लड़ रहे हैं। ऐसा दोनों कोर्ट में डेटा रखा कि बेंगॉल और बिहार में करीब 65 लाख वोटर्स को मतलब। बहुत गलत तरीके से उनका वोट काट दिया गया। अपारदर्शी एलगोरिदम की बात हुई थी। इस पर आप क्या विचार रखेंगे? और मेरा 1 सिम्पल सा सवाल है कि अगर इलेक्शन कमीशन चुनाव से पहले 1 क्लिक में लाखों वोटर्स, खासकर गरीब और मालाइज कम्यूनिटी के लोगों को हटा सकता है, तो क्या पूरी इलेक्शन प्रोसेस की ही कॉम्प्रमाइज नहीं हो जाएगा? नहीं, बिल्कुल बहुत गलत तरीके से एस आई आर किया जा रहा है। पहली बात तो ये कहना कि भई, आप लोग फॉर्म भरिए, तभी आपका नाम ड्राफ्ट रोल में आएगा, यही गलत है। बहुत सारे लोग नहीं भर पाते, फॉर्म कुछ मागरें उनका नाम आपने बाहर कर दिया। फिर आप कहते हैं कि तुम फॉर्म सिक्स भरो, जो कि न्यू वोटर्स का है, तब तुम्हारा नाम वापस आएगा। अच्छा। फिर आप कह रहे हैं कि अच्छा जो जिनके नाम हैं, उनके नाम हटाने के लिए अगर कोई ऑब्जेक्शन आते हैं तो वो हम लेंगे। लेकिन आप किसी को पब्लिक नहीं करते। तो जनता को नहीं पता होता कि भई, पहले तो ये लोग ड्राफ्ट रोल भी बाहर नहीं कर रहे थे, फिर सुप्रीम कोर्ट के कहने पर किया। अब कह रहे हैं कि हम मशीन रीडेबल फॉर्म में नहीं देंगे, क्योंकि मशीन रीडेबल फॉर्म से प्रिवेसी का हनन हो जाएगा। अरे मशीन रीडेबल फॉर्म में से तो सर्चेबल बन जाएगी न। आपने 1 नाम डाला आप सर्च कर सकते हैं। पूरी लिस्ट को उससे प्रविसि से क्या मतलब। आप पूरी लिस्ट दे रहे हैं, उसको आप सर्चेबल बना रहे हैं। दैट्स ऑल सही बात है सो। लेकिन वो ये चाहते हैं कि कोई पारदर्शता न रहे। तो लोगों को कुछ न पता लगे कि किनके नाम काटे गए हैं, किनके नाम जोड़े गए हैं, किनके एप्लिकेशन आइए नाम जोड़ने की, जिनकी एप्लीकेशनस आइये नाम काटने की, यह सब कुछ न पता लगे। और ये भी बहुत सारी न्यूज आ चुकी है कि सेंट्रल सीईसी से माइक्रो ऑब्जर्वर्स तो खैर वहां भेजे गए हैं वेस्ट बंगाल में, लेकिन इंस्ट्रक्शंस भी सीधे आते हैं कि इनके नाम पर ऑब्जेक्शन भेज। 2 इनके नाम हटा, 2 अब वो लोकल जो इलेक्ट्रॉन रजिस्ट्रेशन ऑफिसर हैं। वो तो स्टेट गवर्मेंट का होता है। जहां जहां स्टेट गवर्मेंट इनके कब्जे में नहीं है, वहां वहां तो कई बार नहीं मानते। इनके जो डायरेक्शंस हैं। लेकिन जहां स्टेट गवर्मेंट जैसे गुजरात है, गुजरात में न्होंने 1 करोड़ लोगों के नाम हटा, दी मनमानी हो जाती है, वहां पर है, वहाँ पर बिल्कुल मनमानी हो रही। पर सर क्या सुप्रीम कोर्ट फोरेंसिक ऑडिट नहीं करा सकता, करा सकता है, करना भी चाहिए। तो क्यों न खासकर। जो राहुल गांधी ने अपने प्रेस कॉन्फ्रेंसेस में रिवील किया कि भाई 2, 200 लोग, 2, 200, 1 ही जाने का नाम 200 जगह जगह पर है तो जी ऑडिट होनी चाहिए, वो होनी चाहिए। लेकिन अब क्यों नहीं कह रहे है। यह तो सुप्रीम कोर्ट से पूछना चाहिए कि क्यों नहीं कह रहे और नहीं कह रहे है नहीं। लेकिन जब मामला अगर लोकतंत्र से जुड़ा हो तो फिर सुप्रीम कोर्ट अगर इसमें हस्तक्षेप नहीं करेगा सही तरीके से, तो फिर तो बहुत मुश्किल हो जाएगा न। सर मुश्किल हो ही रहा है, मुश्किल हो ही रहा है। यह तो सब सब देख रहे हैं की इलेक्शन कमीशन जो है बिल्कुल पार्टीशन है, बिल्कुल सरकार के कब्जे में हो गया है। लेकिन फिर भी सुप्रीम कोर्ट उस इलेक्शन कमीशन को इतना तब जो दे रहा है, उनको मनमानी करने दे रहा है। और जो 1 हम लोगों ने चैलेंज किया हुआ है जो कानून जिससे इलेक्शन कमीशन उन्होंने अपने कब्जे में कर लिया है। पहले कांस्टीट्यूशन बेंच का जजमेंट आया कि भई सलेक्शन कमिटी सरकार के कब्जे में नहीं हो सकत, उसमें प्राइम मिनिस्टर लीडर ऑफ ऑपोजिशन और चीफ जस्टिस होंगे। उन्होंने चीफ जस्टिस को हटा के 1 कानून बना दिया, चीफ जस्टिस को हटा के को रख लिए और सेंट्रल मिनिस्टर रख लिया। तो अब मोदी, अमित शाह और राहुल गांधी, राहुल गांधी डिसेंट नोट लिखते रहे हैं। उसको कूड़े में डाल दिया जाता है। जिसको चाहते है वो अपंटलबीतोवहहोगया की 1 खिलाड़ी है, उसने अपना रेफरी चुन लिया है। बिल्कुल तो अब इलेक्शन कमीशन पूरा इनके कब्जे में है। सिर माखौल उड़ाया जा रहा है, हम आम नागरिक का है। 1 तरह से बिल्कुल मखौल उड़ाया जा रहा है। इलेक्शन प्रोसेस अब वो नहीं रहा। बहुत सारे प्रॉब्लम्स खड़े हो गए हैं, जिसकी वजह से अब लोग ये नहीं मानते कि बिल्कुल इंडेपेंडेंट है इलेक्शन कमीशन। और हमारे चुनाव बिल्कुल इंडेपेंडेंट ली हो रहे हैं। यह नहीं मानते तो सिर लोकतंत्र में से अब लोग कहाँ हैं। लोकतंत्र तो बहुत कमजोर हो गया है, हिंदुस्तान का बहुत कमजोर हो गया है। लोकतंत्र मजबूत होने के लिए फ्रीडम ऑफ स्पीच पूरा होना चाहिए। यह नहीं हो सकता कि भई आप प्रोटेस्ट भी नहीं कर सकते। आपने सरकार के खिलाफ कुछ बोला तो आपको अरेस्ट कर लिया जाएगा। आपके यू ट्यूब के वो डिलीट कर दिए जाएंगे। सरकार के कहने पर वगैरह वगैरह उसी से ही बहुत कमजोर हो जाता। और अगर आप ऐसा माहौल बना दे की प्रोटेस हो ही नहीं सकते, सरकार के खिलाफ कोई बोल ही नहीं सकता। तो ऑबवियसली लोकतंत्र कहाँ बचेगा। अच्छा भारत के अधिकांश युवा सोचते हैं कि जजों का चयन भी आईएस के तरीकों से ही होता है। लेकिन हमारी उच्च न्यायपालिका जो है सुप्रीम कोर्ट, उसमें जज कोल्जियम सिस्टम से बनाए जाते हैं और खुद ही खुद को चुन के जाते हैं। अपने पोजीशन के लिए। आपने इस पार मतलब अपारदर्शी और भाई भतीजावाद के सिस्टम को लेकर के काफी सवाल उठाया है। फिर भी कुछ खास फर्क नहीं पड़ रहा है। तो यदि सरकार जज नियुक्ति करना स्वतंत्र नहीं होगा तो फिर इस देश में सुप्रीम कोर्ट पर आखिर 1 आम जन कितना और कब तक भरोसा कर सकता है? नहीं, ये बहुत बड़ी प्रॉब्लम हो गई है। देखिये, पहले तो सरकार नियुक्त करती थी, तो उन्होंने फिर इंडिपेंडेंस ऑफ जुडिशरी के आधार पर ये पॉवर अपने हाथ में ले ली। जुडिशरी में की भई सीनियर 5 जज जो हैं वो सेलेक्ट करेंगे जजेस को। अब इससे थोड़ा तो इम्प्रूवमेंट हुआ कि थोड़े और इंडेपेंडेंट जजेस अपॉइंट होने लगे। लेकिन जो आर्बिटरिनेस और जो भाई भतीजावाद नेपोटिज्म वगैरह जो पहले था, वो तो चलता रहा। क्योंकि अब कोलेजियम के जो लोग हैं वो कई बार अपने ही भाई भतीजों को, अपने ही दोस्तों को, अपने ही जानकारों को बना देते है। और क्या इसका कारण यह भी हो सकता है जिसमें आप फेवरेटिज्म वाली बात जब कर रहे थे। जजों में भी कि ये केस उनको दे। 2 ये वो साइड लॉजी के हैं, तो पकड़ लेंगे। हां हां देखिये सुप्रीम कोर्ट में, हाई कोर्ट में सब जानते हैं की कौन से जज किस टाइप के है, कौन जजेस इंडिपेंडेंट हैं, कौन सरकारी हैं, कौन कम्यूनल है, सब जानते हैं। इसलिए ये भी सब जानते हैं कि कोई पोलिटिकली सेंसिटिव केस है, जिसमें सरकार का कोई बहुत इच्छा है कि वे इस तरह से तय हो। उसको किसी पर्टिकुलर बेंच में अगर आप भेज देंगे तो उसका आउटकम सबको पता है। क्या हम जस्टिस बेला त्रिवेदी को जो केस मिला उमर खालिद का क्या हम से 1 उदाहरण के तौर पर लेकर चले से। तो क्यों इनको बेल नहीं मिल रही है। सिर वही बात है, सरकार नहीं चाहती। और चीफ जस्टिस पर उनका इन्फ्लुएंस होता है, तो फिर वो वहीं जाते हैं उन्ही जजेस के पास। वो उस तरह के जो केस हैं जो सरकार के खिलाफ नहीं जाएंगे। उमर खालिद के पूरे केस को आप कैसे देखते हैं? सर जेमा, उमर खालिद दोनों के। उमर खालिद के खिलाफ तो कुछ भी नहीं है। उसके इतने सारे वीडियोज हैं, उसके स्पीकर्स के। किसी में भी कोई ऑब्जेक्शनेबल चीज नहीं कह रहा। आप उसको कॉन्सप्रेसी कॉन्सप्रेसी कह रहे हैं? कॉन्सप्रेसी भी इस आधार पर कि कोई प्रोटेक्टेड विटनेसेज हैं। उन्होंने बोल दिया कि भई हमने उनको सुना था, ये प्लान करते हुए उसके आधार पर आप बैल नहीं। दिनाय आपने सर्जीलेमामका वीडियो देखा है, बहुत बार देखा होगा, सर आपने है, जिसमें गलती नजर आती है। नहीं थोडी सा, थोड़ा सा। उसने ज्यादा बोल दिया, उतना ज्यादा बोलने की जरूरत नहीं थी। लेकिन फिर भी उसमें कोई ऐसा ऑफेंस नहीं है जिसके आधार पर आप उसको बैल डिनाय कर सके। यह कैसे तय होगा। अगर कोई कहे की हम चिकन नेक को काट ही देंगे तो ये कैसे तय होगा कि वो बड़ी अपराध की श्रेणी में नहीं आएगा। नहीं नहीं, वो तो ठीक है, कोई लोग बढ़ चढ़ कर कुछ कुछ बोल देते हैं। सुप्रीम कोर्ट इस पर कह चुका है कि लोग बढ़चढ़कर कुछ बोल देते हैं। जब तक कोई वो वायलेंस न कर रहे हों या वायलेंट एक्ट प्लान न कर रहे हो, तब तक आप नहीं कह सकते। पर मैं ये समझता हूँ कि चश्मे का हो सकता है फर्क की वो जो बात जिसने कहीं वो मुसलमान था, हिंदू नहीं था, हिन्दू होता तो शायद 1 पल को बच भी सकता था। क्या आप ऐसा मानते हैं? है बिल्कुल इनके कितने सारे हिंदु हैं। ये जो नरसिंगा नंद और दुनिया भर के लोग जो कि हर रोज इस तरह की बातें कह रहे हैं, वायलेंस प्रीच कर रहे हैं, मारने को कह रहे हैं, उनको खुली छूट दी जा रही है, उनको नहीं गिरफ्तार किया जा रहा है। यू पी एम ें जमानत मिलना बहुत मुश्किल हो गया है। तो इसका सलूशन क्या होगा? सर, क्योंकि नया नए कानून तो बना दिए गए हैं। बी एन एस आ गया है, उसमें कहा जा रहा है कि थोड़ा बहुत सहुलियत मिलेगा, लेकिन कहा है सहूलियत, ये तो 1 स्पेशल कानून है। यू पी ए तो यू ए पी एम बेल का प्रोविजन उन्होंने बहुत ही मुश्किल कर दिया है। ये बोल दिया है कि जब तक कोई जज ये न कह दे कि इसके खिलाफ कोई प्राइम फेसी एविडेंस नहीं है, तब तक उसको बेल नहीं दी जा सकती। अब ट्रायल शुरू होने से पहले कैसे जज कह दे। कोई प्रोटेक्टेड विटनेस कह रहा है कि हमने उसको सुना प्रोटेक्टेड विटनेस का वैसे कोई ज्यादा उसको वेट नहीं देना चाहिए। लेकिन अनफॉर्चुनेटली कानून तो खैर बिल्कुल गलत है और सुप्रीम कोर्ट को कायदे से स्ट्राइक डाउन कर देना चाहिए जो बेल का प्रोविजन है। आर्टिकल ट्वेंटी वन के बिल्कुल खिलाफ है। यह ठीक है। 2 हज़ार 20 में 1 रुपए का फाइन। वो हमेशा ये देश याद रखेगा और लॉ के स्टूडेंट तो कम से कम याद रखेंगे। हमेशा 2020 में न्यायपालिका पर किए गए आपके 2 ट्वीट इतने भारी पड़ गए की आप पर अवमानना का केस लगा और आपने गांधी की बात करते हुए कहा कि मैं माफी नहीं मांगूंगा, मैं जेल जाना पसंद करूंगा। क्यों किया था सर आपने ये और आपको क्या लगता है कि अधिकांश लोग बुद्धिजीवी समाज या वकील उनकी चुप्पियों के खिलाफ था। ये जो भी आपने किया, मुझे तो जो चीज बहुत स्ट्रोंगली लगती है, मैं उसको बोलता हूँ। तो मुझे 2 चीजें बहुत स्ट्रोंगली लग रही थी कि कोविड में सुप्रीम कोर्ट को वर्चुअली शट डाउन कर दिया गया था। बहुत कम केसेज लिए जा रहे थे, वो भी वर्चुअल रिंग पर और वहाँ 1 चीफ जस्टिस, जिन्होंने ये सब फैसले लिए थे, वो अपना 50 लाख की 1 भाजपा के आदमी की मोटर साइकिल पर बैठे हैं, मास्क भी नहीं पहने हैं। तो मुझे गुस्सा आया तो मैंने वो ट्वीट कर दिया। उसके बाद ये भी मैं देख रहा था कि सुप्रीम कोर्ट के फैसलों की वजह से हमारा लोकतंत्र जो है खतरे में आता जा रहा है और उसका कोई प्रोटेक्शन नहीं किया जा रहा जो सुप्रीम कोर्ट को करना चाहिए। इसलिए मैंने ये बोला कि जब इस देश में लोकतंत्र के पतन का इतिहास लिखा जाएगा तो उसमें सुप्रीम कोर्ट और खासकर पिछले। 4 चीफ जस्टिस के रोल को अंडरलाइन किया जाएगा। तो ये मैं फील करता था तो मैंने लिखा और जब उन्होंने कंटेंट नोटिस दिया तो मैंने उसको पूरा जस्टीफाई किया कि क्यों मैंने ये लिखा था इतनी सारी चीजें इन्होंने करीं या नहीं करीं जिसकी वजह से मैं ये फील करता हूँ और अगर मैं ये फील करता हूँ तो मेरा ये कहने का पूरा हक है। लोकतंत्र में हर नागरिक का यह कहने का हक है कि न्यायपालिका नहीं, वो काम कर रही है जो उसको करना चाहिए। और वही मैंने बोला था। 1 आखिरी सवाल सर कितने बरस के हो रहे हैं, आप में सिक्स्टी नाइन का हो चुका तो इस साल आप 70 के हो जायेंगे, इस साल 70 के हो जाएंगे, 70 बरस के होने जा रहे हैं सिर और मैं आपसे जानना चाहता हूँ, आपसे 1 मशवरा चाहता हूँ 1 20 साल के भारतीय युवक को कि वो अपने आने वाले भविष्य में इन सरकारों के खिलाफ, गलत नीतियों के खिलाफ, फिर वो चाहे किसी भी प्रोफेशन से क्यों न आता हो, कितनी जरूरत है लड़ने की, बोलने की, फैसले लेने की, बहुत जरूरत है। क्योंकि आज जिस तरह ये देश पतन की ओर बढ़ रहा है, उसमें अगर लोग खड़े नहीं हुए और उसको रोकने की कोशिश नहीं करी, तो तो सभी बर्बाद होंगे, पूरा देश बर्बाद होगा, ये थोड़ी है कि आप सिर्फ मुसलमानों को ही खत्म कर देंगे। मुसलमानों के बाद दूसरों का नंबर आएगा। ये तो पूरे विश्व के इतिहास में है कि अगर आप किसी के साथ नाइंसाफी करते हैं। और जैसे हिटलर ने जूस का कत्लेआम किया, लेकिन फिर पूरे दुनिया का ही कर रहा था। इसी तरह से यहाँ पर अगर आप मुसलमानों का कतलेआम करेंगे, जैसा ये लोग चाहते हैं और बोल रहे हैं बहुत सारे लोग, तो फिर दूसरों का नंबर भी आएगा। पूरा देश ही पतन की तरफ जा रहा है। तो इसलिए सब लोगों को खड़े होकर कुछ कुछ तो काम करने की जरुरत है। पहली बात तो अपनी आँख और कान खोल कर रखना है, देखना है कि कहाँ पर अन्याय हो रहा है, कहाँ लोकतंत्र का गला घोटा जा रहा है, उसके खिलाफ कम से कम अपनी आवाज तो उठाये। उसके बाद अगर कोई संस्था बना कर, ऑर्गेनाइज होकर कुछ और सड़क पर उतर सके तो वो करें, लेकिन कम से कम आवाज़ तो उठाए। ये करना तो सभी के लिए जरूरी है। शुक्रिया सर हमसे बातचीत करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद। थैंक यू अनिल, तुमने यह बहुत अच्छा इंटरव्यू किया और जो तुम काम कर रहे हो, यह बहुत अच्छा काम है। तुम रियल इशूज पर इंटरव्यू करते हो और मुझे पूरी उम्मीद है कि आगे चलकर तुम पत्रकारिता में बहुत बड़ा नाम कमाओगे और इस देश के भविष्य के लिए बहुत अच्छे अच्छे काम करोगे।